मित्रों,
16
महीनों से मैं किसान हूँ, और कृषि सम्बंधित यह मेरा पहला लेख है। यह लेख किसानों
के लिए है.. लेकिन जो किसान नहीं हैं.. उनको भी ये लेख इसलिए पढ़ना चाहिए... भले ही
आप किसान नहीं हैं... लेकिन किसानों द्वारा उत्पादित अनाज, फल, सब्जी आदि का उपयोग
तो कर ही रहें हैं।
आप
क्या खा रहें हैं ? क्या खाना चाहिए ? इसे आपको अवश्य जानना चाहिए।
मैं
14.03.2024 से 19.03.2024 तक Mobile
Agricultural School And Services (MASS) राँची में Agricultural Technology
Management Agency (ATMA) योजना के अंतर्गत 6 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग
लिया।
मैं
इन 6 दिनों में जो सीखा उसे आप इस लेख को 1 या 2 बार पढ़कर समझ सकते हैं।
प्रशिक्षण
का विषय था - जैविक विधि से मोटे अनाज का उत्पादन एवं सब्जी की खेती।
मोटे
अनाज कौन कौन से है ?
1. रागी (मरुआ)- इसमें प्रोटीन विटामिन, आयरन,
कैल्शियम और विटामिन-बी पाया जाता है। यह मधुमेह और रक्तचाप जैसी बीमारियों में
लाभदायक साबित होता है.
2. कोदो - इसमें सबसे ज्यादा मात्रा में प्रोटीन,
फाइबर और कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है. इसके सेवन से डायबिटीज, कैंसर और पेट
संबंधी समस्याएं खत्म होती हैं।
3. कुटकी (लिटिल मिलेट्स) - इसमें सबसे ज्यादा मात्रा में कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन पाया जाता है. इसके सेवन से डायबिटीज पेशेंट को काफी राहत मिलता है। वहीं यह कैंसर मरीजों के लिए रामबाण माना जाता है।
4. संवा (बार्नयार्ड मिलेट्स) - इसमें सूजनरोधी गुण
होते हैं. और यह हृदय रोग और मधुमेह जैसी बीमारियों में रामबाण साबित
होता है।
5. ज्वार - इसमें मिनरल, प्रोटीन और विटामिन बी
कॉम्प्लेक्स जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें कैल्शियम और आयरन
भी पाया जाता है।
6. बाजरा - बाजरा में प्रोटीन, फाइबर, अमीनों एसिड
जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. इसमें विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा और
कुपोषण को दूर करने की भी क्षमता है।
7. कंगनी (फॉक्सटेल मिलेट्स) - प्रोटीन, फाइबर,
आयरन,.पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
8. चेना (प्रोसो मिलेट्स) - विटामिन-बी, आयरन और
जिंक शामिल है. यह वसा और कोलेस्ट्रॉल मुक्त होता है।
इन
8 अनाज को मोटे अनाज की श्रेणी में रखा गया है, जिसे मिलेट्स कहते हैं और सुपर फ़ूड
भी।
वर्ष
2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स के तौर पर मनाया गया था।
हमारे
पूर्वजों को इन फसलों का ज्ञान था, इसका उत्पादन करते थे, इसका सेवन करते थे और
स्वस्थ रहते थे।
1968
में अमरीकी कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग जिनको हरित क्रांति का जनक माना जाता हैं
और 1970 में जिनको नावेल पुरस्कार भी मिला था... कृषि के आधुनिकीकरण के नाम पर
भारत में कृषि के पारंपरिक तरीकों को बदलकर, मोटे अनाजों के उत्पादन को बंद कर दिया
गया, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं, हाइब्रिड बीजों, का प्रयोग शुरू हुआ और आज
इन 56 वर्षों में हमारा पूरा देश इस तथाकथित आधुनिकीकरण के नाम पर बीमार हो गया
है, पूरा कृषि योग्य जमीन बंजर होने के कगार पर पर है,पानी का स्तर लगातार नीचे जा
रहा है उर्वरकों की मात्रा बढ़ती जा रही है, किसानों की आमदनी कम होती जा रही है।
अब
जाकर 2023 में दुनियाँ को पता चला की भारत कि पारम्परिक खेती जिसमे मोटा अनाज
शामिल था सुपर फ़ूड है जिसे पानी भी कम चाहिए, उर्वरक भी नहीं चाहिए और पोषक तत्वों
में गेहूं चावल से कई गुना अधिक है।
हम
अमरीका या पश्चिमी देशों से बिना सोचे समझे प्रभावित हो जाते हैं।
समय
के साथ दुनियाँ को भारत के सभी प्राचीन परम्पराओं का लोहा मानना होगा, लेकिन पहले
हम तो अपने परम्पराओं पर गर्व करना सीखें।
अब
प्रशिक्षण के अनुभवों की चर्चा करते है।
यह
प्रशिक्षण बिलकुल मुफ्त था। जाना, आना, खाना, रहना, घूमना सब मुफ्त था।
मैं
13 तारीख को रात 8 बजे दरभंगा स्टेशन पर पहुंचा मेरे पास ATMA के टीम लीडर श्री
आकाश जी का नंबर था मैंने उनको फोन किया थोड़ी देर में वो भी स्टेशन पर आ गए। हमारे
टीम में कुल 16 सदस्य थे, स्लीपर क्लास में टिकट था। ट्रेन आने के बाद मुझे सामान
चढाने में भी एक मित्र (संदीप जी) मेरी सहायता की और आकाश जी के मदद से मुझे एक
नीचे का बर्थ मिला। देर रात थोड़ा ठंढ लगा, मेरे बैग में ओढ़ने के लिए चादर और गर्म
कपडे भी थे, लेकिन ठंढ आलस्य से अधिक नहीं था।
स्लीपर
क्लास के बारे में मैं एक बात बताना चाहता हूँ कि आजकल स्लीपर क्लास भी साफ सुथड़ा
होता है और टॉयलेट भी साफ़ था। मुझे अपनी ट्रेन यात्रा में स्लीपर क्लास को प्रार्थमिकता
देनी चाहिए।
14.03.24
को सुबह 9 बजे हमलोग रांची स्टेशन पहुँच गए। स्टेशन के बाहर MASS की गाड़ी खड़ी थी। गाड़ी
तक सामान पहुंचाने के लिए फिर से संदीप जी ने मेरी मदद की। ऐसे अनजान और अपिरिचित लोगों
को मदद करने की प्रवृति सबसे अधिक किसानों में होती है।

लालगढ़ झील
2 घंटे
के बस के सफर के बाद हमलोग MASS के प्रशिक्षण संस्थान में पहुँचा जो लालगढ़ में है,
आवादी से दूर, बहुत बड़े झील के किनारे प्रकृति के गोद में यह संस्थान है।

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हमें जो कमरा मिला था
- यहाँ
पहुँचते ही हमने सोचा कि यदि यहाँ सिखने को थोड़ा कम भी मिले तब भी इस जगह 6 दिन रहना
ही अपने आप में सुखद होगा। हमें जो कमरा मिला उसमे 5 लोग और रुके थे, जो थोड़े उम्रदराज
थे। दूसरे कमरे में जो नवयुवक थे, वो रुके थे।
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| हमें जो कमरा मिला था |
- यहाँ पहुँचते ही हमने सोचा कि यदि यहाँ सिखने को थोड़ा कम भी मिले तब भी इस जगह 6 दिन रहना ही अपने आप में सुखद होगा। हमें जो कमरा मिला उसमे 5 लोग और रुके थे, जो थोड़े उम्रदराज थे। दूसरे कमरे में जो नवयुवक थे, वो रुके थे।
साफ
सुथरे कमरा एक टॉयलेट एक बाथरूम, वो भी साफ सुथरा। विस्तार पर साफ उजला चादर। मेरा
जगह खिड़की के पास था। हमलोग फ्रेश होकर खाना खाने गए। डाइनिंग हॉल भी साफ सुथरा और
खाना भी स्वादिष्ट।
पहला दिन - 14.03.2024 (गुरुवार)
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क्लास रूम
पहला
दिन दोपहर के बाद श्री मदन कुमार जी के द्वारा क्लास शुरू हुआ। आज का दिन एक दूसरे
से परिचय होने में ही निकल गया। हमलोगों को एक नोटबुक और एक कलम दिया गया। मदन जी यहाँ
के व्यवस्था, खाने पिने का समय सारणी, शराब आदि के निषेध के बारे में जानकारी दिए।
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मदन
जी पुरे सत्र के दौरान शुरू से लेकर प्रमाणपत्र मिलने तक निर्देशित करते रहे। इनके
व्यव्हार में सज्जनता थी।
दूसरा दिन - 15.03.2024 (शुक्रबार)
आज
के प्रशिक्षक थे श्री विजय कुमार सिंह।
विजय
जी ने एक वीडियो दिखाया आमिर खान के सत्यमेव जयते का एक एपिसोड था। इस वीडियो को मैं
पहले भी देखा था और इसे देखने के बाद ही मेरे मन में जैविक खेती करने का विचार आया
लेकिन इस विचार को नौकरी करते हुए क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता था।
इस
वीडियो का लिंक दे रहा हूँ।
https://www.youtube.com/watch?v=Fbc5K9EpTQw
आपसे
निवेदन है कि आप चाहे खेती करते हों या कोई अन्य काम इस वीडियो को जरूर देखिये। अपने
जीवन से 1 घंटा 5 मिनट 20 सेकेण्ड का समय निकालिये और इसे देखिये। इतना समय देकर आप
अपने जीवन के कुछ समय को बढ़ा सकते हैं।
आज
जिस जैविक खाद को बनाने का तरीका बताया गया उसकी चर्चा करते हैं -
1.घनजीवामृत- (एक एकड़ के लिए)
सामिग्री-
गाय
का गोबर- 20 किलो
गौमूत्र-
2 लीटर
गुड़-
2 किलो
बेसन
2 किलो
दीमक
मिटटी- 1/2 किलो
(नोट-
दीमक मिटटी उपलब्ध ना हो तो पीपल के पेड़ के नीचे का मिटटी लीजिये)
बनाने का तरीका -
इन
सामिग्री को अच्छी तरह से मिलाइये, यदि इसे अच्छी तरह मिलाने के लिए थोड़े पानी की आवश्यकता
पड़े तो पानी मिलकर अच्छी तरह मिला लीजिये।
अच्छी
तरह मिलाने के बाद इसका कण्डा (गोइठा) बनाइये और 7 दिन तक छावं में सुखाइये। सूखने
के बाद इसे कुटकार जूट के बोर में 2 दिन तक रखिये। आपका घनजीवामृत तैयार है।
उपयोग की विधि -
उपयोग
से पहले इसे 100 किलो वर्मीकम्पोस्ट में मिलाकर 1 एकर खेत में छिड़काव कर दीजिये। वर्मीकम्पोस्ट
उपलब्ध ना हो तो पुराने गोबर का इस्तेमाल कर सकते हैं।
पुरे
फसल के दरम्यान 3 बार घनजीवामृत का प्रयोग कीजिये।
एक
बार घनजीवामृत बनाने के बाद आप 6 महीने तक इसका प्रयोग कर सकतें हैं।
लाभ-
1. यह प्राकृतिक कार्बन, नाइट्रोजन,
फॉस्फोरस, पोटेशियम और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों
का एक उत्कृष्ट स्रोत है।
2. जीवामृत पौधों को मिट्टी से
पोषक तत्वों को आसानी से अवशोषित करने में मदद करता है।
3. जीवामृत के लगातार प्रयोग
करने से भूमि में केचुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है।
4.
फसलों में रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
5. जीवामृत के प्रयोग से उगे
अनाज, फल,सब्जी खाने में अधिक स्वादिष्ट और जहरमुक्त होती है।
जीवामृत- (एक एकर के लिए)
यह
एक तरल खाद है।
सामिग्री -
पानी-
100 लीटर
गाय
का गोबर- 10 किलो
गौमूत्र-
5 लीटर
गुड़-
1 किलो
बेसन
1 किलो
दीमक
मिटटी- 1 किलो
बनाने का तरीका -
100
लीटर में इन सामिग्री को अच्छी तरह मिला दीजिये। गुड़ और बेसन को अलग से पानी में घोल
कर डालिये। 4 दिनों तक सुबह शाम किसी डंडे की सहायता से कम से कम 5 मिनट तक घुमाइए।
आपका जीवामृत तैयार है।
उपयोग -
इसका
उपयोग 7 दिनों तक कर सकते है लेकिन इसे छायादार स्थान पर रखिये।
10
लीटर पानी में 1 लीटर जीवामृत मिलाकर इसका छिरकाव कर सकते है, इसे ड्रिप के साथ मिटटी
में डाल सकते है या सिचाई के समय पानी के साथ डाल सकते है।
इसका
छिड़काव शाम के समय करना चाहिए।
15
दिन में एक बार इसका छिड़काव करना चाहिए।
लाभ-
इसका
लाभ घनजीवामृत के सामान ही है। इसके छिड़काव
का एक अलग लाभ ये है कि यह थोड़ा कीटनाशक कि तरह भी व्यवहार करता है।
बीजामृत (एक एकड़ के लिए)
बीजामृत
का उपयोग बीज के उपचार के लिए किया जाता है।
सामिग्री-
पानी-
20 लीटर
गाय
का गोबर- 5 किलो
गौमूत्र-
5 लीटर
दीमक
मिटटी- 1 किलो
चुना-
50 ग्राम
एक
सूती कपडा और एक डंडा
एक
चलनी
बनाने का तरीका -
5 किलो
गोबर को सूती कपडे में डालकर 12 घंटा पानी में डूबा कर रखेंगे।
12
घंटे के बाद पोटली को निचोड़कर पानी से बाहर निकाल देंगे।
5 लीटर
गौमूत्र मिलाएंगे।
1 किलो
मिटटी मिलाएंगे।
अब
पानी को छानकर उसमे 50 ग्राम चुना मिला देंगे। आपका जीवामृत तैयार है।
उपयोग-
धान,
गेंहूं आदि कोई भी बीज जिसे हम खेत में डालने वाले है इस बीजामृत में भिंगो कर 2 घंटा
छाए में सूखा देंगे।
जो
पौधे होंगे नर्सरी के उसे खेत में लगाने से पहले इसके जड़ को आधा घंटा तक इस बीजामृत
में डुबोकर रखेंगे उसके बाद उसे खेत में लगा देंगे।
लाभ-
बीजों
को विभिन्न रोगों से बचाता है।
बीजों
की अनुकूलन क्षमता को बढ़ाता है, जिससे पौधों के मरने की दर कम हो जाती है।
भूमि
जनित रोगों को नियंत्रित करता है।
बीज
के अच्छे अंकुरण के लिए महत्वपूर्ण घटक है।
बीजों
और उससे अंकुरित हुए कोमल जड़ों को रोगों तथा कवक से हमलों से बचाने में कारगर है।
पौधे
के तेज़ विकास के अलावा मिट्टी की उर्वरा सुधारने में बेहद उपयोगी है।
नीमास्त्र (एक एकड़ के लिए)
यह
जैविक कीटनाशक है।
सामिग्री-
पानी-
200 लीटर
नीम
का पत्ता - 10 किलो
गाय
का गोबर- 2 किलो
गौमूत्र-
10 लीटर
बनाने का तरीका -
पत्ते
को बारीक़ कूट लें, संभव हो तो पीस लें।
कुटे हुए पत्ते को पानी में दाल दें फिर गोबर और गौमूत्र भी डालकर 2 दिन तक दिन में 2 बार डंडे
कि सहायता से हिलाएं। आपका नीमास्त्र तैयार है।
उपयोग और लाभ -
15 दिन में एक बार हरेक प्रकार के फसल में छिड़काव करें। जैविक कीटनाशक के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात ये समझ लीजिये कि यह कीड़ों को मारता नहीं है, यह कीड़ा लगने ही नहीं देता इसलिए कीड़े लगने कि प्रतीक्षा मत कीजिये हर 15 दिन पर डालते रहिये। कीड़े लगेंगे ही नहीं।
ब्रह्मास्त्र (एक एकड़ के लिए)
यदि
नीमास्त्र काम नहीं करे तो ब्रह्मास्त्र का उपयोग कीजिये।
सामिग्री-
पानी-
200 लीटर
नीम
का पत्ता - 10 किलो
गाय
का गोबर- 2 किलो
गौमूत्र-
10 लीटर
बनाने का तरीका -
पत्ते
को बारीक़ कूट लें, संभव हो तो पीस लें।
कुटे हुए पत्ते को पानी में दाल दें फिर गोबर और गौमूत्र भी डालकर 2 दिन तक दिन में 2 बार डंडे
कि सहायता से हिलाएं। आपका नीमास्त्र तैयार है।
उपयोग और लाभ -
15
दिन में एक बार हरेक प्रकार के फसल में छिड़काव करें। जैविक कीटनाशक के सम्बन्ध में
एक महत्वपूर्ण बात ये समझ लीजिये कि यह कीड़ों को मारता नहीं है, यह कीड़ा लगने ही नहीं
देता इसलिए कीड़े लगने कि प्रतीक्षा मत कीजिये हर 15 दिन पर डालते रहिये। कीड़े लगेंगे
ही नहीं।
आग्नेयास्त्र
यह
भी भी एक जैविक कीटनाशक है। यदि कीट का प्रकोप बहुत अधिक हो तो इसका प्रयोग करना चाहिए।
सामिग्री-
तम्बाकू-
1 किलो
लहसुन
- 1/2 कोलो
नीम
का पत्ता - 5 किलो
मिर्च- 1/2 कोलो
गौमूत्र-
10 लीटर
बनाने का तरीका -
गौमूत्र
में सभी सामिग्री को बारीक काटकर यदि संभव हो तो पीसकर अच्छी तरह उबाल लजिए फिर 2 दिन
तक ठंढा होने के लिए छोड़ दीजिये फिर छान लीजिए। आपका आग्नेयास्त्र तैयार है।
2.5
लीटर आग्नेयास्त्र को 100 लीटर पानी में मिलाकर 1 एकर खेत में छिड़काव कीजिये।
3 महीने
तक इसका प्रयोग अधिक प्रभावी रहेगा।
लाभ-
फल
और फूल को कीड़ो से बचाता है, जैविक किनाशक का सबसे बड़ा लाभ ये होता है की यह कीड़े को
नष्ट करने के अलावा मिटटी के उर्वरक क्षमता को भी बढ़ाता है।
खट्टी मठ्ठा (छाछ) का प्रयोग -
खट्टी
मठ्ठा (छाछ) भी एक अच्छा फफूंदनाशी दवा है। एक किलो को दही को 3 दिन तक छोड़ दीजिये
फिर उसे 15 लीटर पानी में मिला कर पौधों पर छिड़काव कीजिये।
तीसरा दिन ( 16.03.2024,शनिवार)
![]() |
| लतरातू डैम पर |
चौथा दिन ( 17.03.2024,रविवार)
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क्लास रूम
आज
प्रशिक्षण देने के लिए 3 महाविद्यालयी छात्राये आयी थी जो वहाँ इन्टर्नशिप के लिए पहुंची
थी। सबने अपना नाम तो बताई थी लेकिन मझे स्मरण नहीं है। उनके पास व्यवहारिक ज्ञान का
तो अभाव था लेकिन कई ऐसी किताबी बातें भी बताई जिसे व्यवहार किया जाना चाहिए।
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इन
बच्चियों ने नर्सरी के बारे में कई उपयोगी जानकारी बतलाई।
जैसे
लत्तीदार पौधों को बड़े साइज के ट्रे में लगाना चाहिए और मिर्च, टमाटर जैसे छोटे बीज
वाले पौधों को छोटे साइज के ट्रे में लगाना चाहिए।
ट्रे
के नीचे प्लास्टिक बिछाना चाहिए ताकि पौधों के जड़ को मिटटी का संपर्क नहीं हो।
कोकोपिट
को 4-5 बार पानी से धोना चाहिए।
4 पत्ते
निकले के बाद प्लांटेशन किया जाना चाहिए।
नर्सरी
में सुबह को पानी देना अच्छा।
गर्मी
में 2 बार और शर्दी में 1 बार पानी देना चाहिए।
खाने
के बाद हमलोगों को वहाँ के नर्सरी में घुमाया गया और बताई गयी बातों को प्रतेक्ष दिखाया
गया।
पाँचवाँ दिन ( 18.03.2024,सोमवार)
आज
का क्लास प्रशिक्षण केंद्र के बड़े मीटिंग हॉल में हुआ और उसमे छपरा जिले से आये हुए
किसान के टीम भी शामिल थे। आज के प्रशिक्षक श्री मदन जी थे उनके साथ वो तीन छात्राएं
भी थी जो पिछले दिन भी प्रशिक्षण दी थी।
आज
के प्रशिक्षण में कुछ रासायनिक दवाइयों के विषय में जानकारी दिया गया जो मेरे रूचि
का विषय नहीं था। क्लास में एक बार मदन जी मेरे पास आये और मुझे मेरे तवियत का हाल
पूछा उन्हें लगा की मैं आज थोड़ा सुस्त जैसा हूँ। मैंने उन्हें अपने बिलकुल ठीक होने
होने का आश्वाशन दिया और ख्याल रखने के लिए धन्यबाद भी।
आज
रासायनिक दवाइयों के अलावा भी कई महत्वपूर्ण जानकारी मिली जो इस प्रकार है -
मिटटी की जाँच -
मिटटी
की जाँच कैसे की जाती है -
मिटटी
की जाँच तो प्रयोगशाला में होगी किसानो को सिर्फ अपने खेतों से मिटटी का सैंपल प्रयोगशाला
तक पहुंचना होता है तो मिटटी का सैंपल कैसे लें -
1. अपने खेत को मिटटी के प्रकार
जैसे बलुआही, दोमट आदि। कभी कभी एक ही खेत में अलग अलग जगहों पर अलग अलग प्रकार की
मिटटी पायी जाती है। मिटटी के प्रकार के हिसाब से खेतों को अलग अलग बाँट लें।
2.
50 डिसमल के क्षेत्र से 8 जगह से मिटटी का सैंपल लेना चाहिए।
3.
खेत के मेड़ से 5 फिट तक कोई सैंपल ना लें।
4. जहाँ गोबर या रासायनिक खाद
को रखा गया हो वहां का सैंपल ना लें।
5. जहाँ पेड़ के पत्ते बहुत समय
से गिरा हो या पेड़ की छाया हो वहां का सैंपल ना लें।
6. सैंपल के लिए उस स्थान को
निर्धारित करें जो पुरे खेत को प्रतिनिधित्व करता हो।
7. स्थान निर्धारित करने के बाद
सैंपल लेने वाले जगहों से ऊपर के मिटटी को बचाते हुए घास-फुस साफ कर दें।
8 "V" आकार का गड्ढा
खोदे 15 सेंटीमीटर गहराई तक।
9. इस गड्ढे के किसी भी तरफ से
1 सेंटीमीटर मोती परत को छीलकर निकालते है।
10.
सभी निर्धारित स्थान से इसी प्रकार मिटटी निकल लें।
11. प्रत्येक स्थान से निकले
गए मिटटी को छाया में सुखाकर अच्छे से मिलावें और इसमें उपस्थित घास कंकर आदि को हटा
दें। फिर इसे एक समतल गोले के रूप में फैलाकर इसे चार भागों में बाँट देंगे। आमने सामने
के मिटटी को रखेंगे, बगल के दोनों हिस्सों को फेक देंगे।
12. यह प्रक्रिया तब तक दोहराएंगे
जब तक 500 ग्राम मिटटी ना बच जाय।
13. आपका सैंपल तैयार है इसे
पॉलिथीन में डालकर अपना और इस खेत का विवरण लिखकर प्रयोगशाला में भेज दें।
बीज उपचार-
बीज
बोन से पहले बीज का उपचार बहुत आवश्यक है और बीज उपचार के लिए बीजामृत का प्रयोग करना
चाहिए। बीजामृत बनाने की विधि ऊपर बताया गया है, इसके अतिरिक्त कुछ जैविक फफूंदनाशक
भी है जिसका उपयोग आप बीज उपचार के लिए कर सकते है। जैसे ट्राइकोडर्मा, इसकी 5 से
10 की मात्रा से 1 किलो बीज का उपचार किया जा सकता है।
मचान बनाना -
लत्तीदार
पौधे के लिए मचान बनाया जाता है। मिर्च और टमाटर जैसे कमजोर तना वाले पौधे के लिए भी
वर्टिकल मचान बनाया जाना चाहिए।
छठा दिन(19.03.2024, मंगलवार) अंतिम दिन।

चिड़ियाँघर में आकाश जी के साथ
पिछले
5 दिनों से इस वातावरण में रहते रहते यहाँ से मोह हो गया। यहाँ से जाने का विचार
से मन ने एक हलकी
सी उदासी के भाव को अनुभव किया। ऐसा प्रकृति ने भी अनुभव किया। यहाँ से निकलते समय
हलकी फुलकी बारिश हुई।

आज
प्रशिक्षण का कार्यक्रम नहीं था। आज घूमना और प्रमाणपत्र वितरण का कार्यक्रम था।
हमलोगों
को रांची के भगवान बिरसा बायोलॉजिकल पार्क ले जाया गया। पक्षिओं के दृष्टि से यह पार्क
मुझे अनोखा लगा। यहाँ कई विचित्र पक्षिओं को मैंने देखा जैसे लाल कबूतर, उजला मोर आदि।
प्रमाणपत्र वितरण -
4 बजे बड़े हॉल में यह कार्यक्रम शुरू हुआ। सबसे पहले हमलोगों को यहाँ के अनुभव को बताने के लिए कहा गया। मैंने बताया की मैं अपना विस्तृत अनुभव अपने ब्लॉग में लिखकर भेज दूंगा।
प्रमाणपत्र वितरण श्री मदन जी और एक अन्य महाशय थे, जो क्लास में कभी आये नहीं थे, उनके द्वारा किया गया। मैं श्री मदन जी के द्वारा प्रमाण पत्र प्राप्त करना चाहता था, क्योंकि पूरी प्रशिक्षण के दौरान इनका गाइड मिल रहा था, ऐसा मैंने अनुरोध भी किया लेकिन उन महाशय को बुरा न लग जाय इसलिए मदन जी ने उन्ही से प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए कहा। बाद में मदन जी भी फोटो में आये।
यहाँ
से निकलने से पहले मैंने उन तीन बहनों को मिलकर धन्यबाद दिया जो किचन में खाना बनाती
थी। वह सिर्फ खाना अच्छा नहीं बनाती थी बल्कि बहुत संजीदगी से खाना खिलाती भी थी। कभी
कभी, किसी किसी पर गुस्सा भी होती थी, जैसे घर में माँ गुस्सा जाती है।
मैं
शाकाहारी था, लेकिन वहां अक्सर मांसाहार बनता था, लेकिन शाकाहारी को पहले भोजन करा
दिया जाता था। मुझे वहाँ खाना खाते हुए कभी भी मांसाहार खाने का गंध भी नहीं लगा। मांसाहार
के लिए वर्तन भी अलग है ऐसा मुझे कहा गया, मैंने इसका जाँच नहीं किया। मैं भोजन के
पवित्रता को अनुभव किया।
यहाँ
से निकलते हुए हलकी रिमझिम वारिश में यहाँ के खूबसूरत फूलों, झील और यहाँ के वातावरण
को निहारा और फिर से यहाँ बुलाने का दरखास्त दे दिया।
8 बजे
रात को ट्रेन थी। सुबह दरभंगा में सबलोग उतर गए, मैं अकेला सकरी तक गया क्योंकि मुझे वहाँ से केरवार
जाना था। उतरने से पहले टीम लीडर श्री आकाश जी ने
नास्ता करने के लिए सबको 100 -100 रूपये
दिए। मुझे देने में उनको थोड़ा संकोच हो रहा था। उसमे एक आदमी बोल रहा था कि नास्ता
तो हो जाएगा, दरभंगा से घर जाने के लिए टैम्पो भाड़ा कौन देगा ? लोभ का तो कहीं अंत
नहीं है लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि हमारी सरकार किसानों को मार्गदर्शन देने के लिए
मुफ्त में, इतनी सुबिधा के साथ, मनोरंजन कराते हुए इतनी जानकारी देने को तैयार है।
MASS के लिए मेरा सुझाव -
आप
किसी काम को चाहे कितना भी अच्छी तरह से निभाएँ उसमे सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को और भी बेहतर किया जा सकता था या भविष्य में किया जा सकता
है। मैं MASS के अधिकारिओं से कुछ निवेदन करना चाहता हूँ -
1. हम जिस फसल का प्रशिक्षण लेने
गए है उसका अनाज नमूने के रूप में देखने को मिलना चाहिए। प्रशिक्षण का विषय था मोटे
अनाज का उत्पादन जैसे रागी,कोदो,कुटकी,संवा,ज्वार,बाजरा,कंगनी और चेना हमने इसमें रागी
को छोड़कर किसी अन्य अनाज को कभी देखा ही नहीं है, मेरे साथ और कई लोग थे जिन्होंने
देखा नहीं था। देखने से चित्र और अधिक स्पष्ट होता है।
2. हम डैम, मंदिर, चिडियांघर
आदि देखने गए यदि घूमने का कोई ऐसा फार्म चुना जाए जहाँ खेती का कोई विकसित मॉडल है।
जो किसानों को बेहतरीन ढंग से खेती करने के लिए प्रेरित करे।
3. डाइनिंग हॉल में या किसी भी
उपयुक्त जगह में एक TV देखने का व्यवस्था होना चाहिए, जहाँ सिर्फ खेती से सम्बंधित
चैनल/You Tube देखा जा सके ताकि जब तक लोग वहाँ रहे तब तक खेती के प्रति प्रेरित रहे।
उपसंहार
मैंने शुरू में लिखा था, "मैं इन 6 दिनों में जो सीखा उसे आप इस लेख को 1 या 2 बार पढ़कर समझ सकते हैं।" लेकिन इस लेख को समाप्त करते करते मेरे समझ में आया कि प्रैक्टिकल क्लास को लिखकर नहीं समझाया जा सकता है। इसे प्रशिक्षण शिविर में जाकर सीखना होगा। यह बिलकुल मुफ्त होता है और आनंददायक भी।
इस लेख को अपने सभी ग्रुप और मित्रों को शेयर कीजिये। कृषि के इस ज्ञानदीप को आगे बढाने में अपना योगदान
दीजिये।
इस सम्बन्ध में और किसी भी प्रकार के जानकारी के लिए आप
मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
इतना लम्बा लेख पढ़ने के लिए आपका अभिनन्दन ।
“भवतु सर्व मंगलम”
आभार
सोहन कुमार
https://sohankumarroy.blogspot.com
चातर, घनश्यामपुर, 07.04.2024(रविवार)



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