मित्रों,
जीवन भले ही बहुत छोटा हो.. और जीवन छोटा है.. ये बात भी बहुत देर से पता चलता है क्योंकि इस छोटे से जीवन की शृंखलाएँ बड़ी लम्बी है।
जन्म लेकर बचपना, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, व्यस्क, प्रौढ़ और बुढ़ापे की एक लम्बी शृंखला दिखती है.. और मजे की बात ये है कि बुढ़ापे को छोड़कर.. हर अवस्था में हर व्यक्ति को अपने से आगे वाला अवस्था में मौज दीखता है।
छोटे बच्चे जब थोड़े से बड़े बच्चे को साइकिल चलाते हुए या दौरते हुए देखता है तो वह सोचता है कि उसकी कितनी मौज है... उसे पता नहीं कि उसे स्कूल भी जाना पड़ रहा है... और स्कूल में उसके साथ में जो हो रहा है वह तो वही जानता है।
स्कूल जाने वाला/वाली सोचता/ सोचती है कि कॉलेज वाले का मौज है, वहां स्वतंत्रता है, यहाँ तो स्कूल से आने के बाद भी माँ-बाप की बंदिश है।
कॉलेज वाला/वाली सोचता/सोचती है नौकरी करने वालों का क्या मौज है ?
कुंवारा/कुंवारी सोचता/सोचती है, शादी के बाद जीवन कितना हसीन होता होगा। और शादीशुदा.........?
जीवन दिनोदिन कठिन होता चला जाता है। मुझे 5 वर्ष से 25 वर्ष तक जीवन लम्बा दीखता था, 40 के बाद तो समय को पंख लग गया है।
मैं 5 वर्ष से 25 वर्ष तक के जीवन को याद करता हूँ.. और 40 से 60 के बीच के समय को याद करता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि समय की गति तेज हो गयी। आंधी कि तरह निकल गयी।
आज का विषय है 60 वर्ष के बाद के जीवन का.. जिसमे मैं अभी प्रवेश किया हूँ। इस जीवन का मुझे अनुभव नहीं है लेकिन जीवन के इस अंतिम समय के लिए हमने जो योजनायें बनायी है उसकी चर्चा करूँगा।
मैं 60 वर्ष पूर्ण होने से कुछ पहले ही नौकरी छोड़ दिया.. नौकरी तो मैं और भी पहले छोड़ दिया था.. लेकिन नौकरी मुझे नहीं छोड़ रहा था। नौकरी छोड़ने में मुझे जितनी मशक्कत करना पड़ा, मुझे ऐसा लगा कि इतनी मशक्कत तो मुझे नौकरी ढूंढने में भी नहीं हुई थी। बॉस लोगों का इतना प्यार था.. छोड़ना नहीं चाहते थे.. और छोड़ने के बाद भी मेरे लिए दरवाजा खोलकर रखें हैं ।
नौकरी छोड़ना मेरे लिए इसलिए आवश्यक हो गया था क्योंकि मैं अपने जीवन के थोड़ा करीब जाना चाहता था और जीवन के करीब जाने के लिए जिम्मेदारिओं से दूर होना आवश्यक था।
मैं अपने पारिवारिक जिम्मेदारिओं से मुक्त हो गया था.. अब सिर्फ नौकरी के जिम्मेदारी को ढ़ो रहा था। ऐसा मैं पैसों के लिए कर रहा था। पैसा तो ऐसा है कि चाहे जितना मिल जाए कम ही लगता है.. इस तरह का 4-5 जीवन भी इस कमी को पूरा नहीं कर पाता।
और जीवन एक ही है... वह भी जाने वाला है।
जीवन को जाते-जाते जीवन को समझ लेने की चाहत है।
जीवन को कैसे समझूँ ?
जीवन को समकझने के लिए जीवन में आनंदित होना बहुत आवश्यक हैं। समझने के लिए नहीं तो जीने के लिए तो आवश्यक होना ही चाहिए। और जीवन का चरम उद्देश्य जो मोक्ष बताया गया है। यदि मोक्ष है तो निश्चय ही परम आनंद जैसी कोई घटना है।
जीवन में आनंद हो इसके लिए आवश्यक है हम अपने जीवन का मालिक हों। अपनी मर्जी,अपना मौज, अपना आनंद, बचपन से आज तक हमेशा अपने से आगे वाले को आनंद में देखते आया हूँ, अब इसके आगे मौत खड़ी है। अपने आनंद का क्या...... ?
जीवन में परम आनंद के लिए अपने पास क्या सब चाहिए ?
1. आपके पास समय हो -
यह बुनियादी बात है... यदि आपके पास समय ही नहीं हो.. और आप अंधी दौर में भाग रहें है.. और ठीक से पता भी नहीं है कि जाना कहाँ है... तो आनंद कहाँ से आएगा ? परम आनंद के लिए फुर्सत चाहिए।
2. आप स्वस्थ हों -
यदि आप स्वस्थ नहीं हैं तो आप आनंद से बहुत दूर हैं, लेकिन यदि आप एक बार आनंद लेने का मन बना लें तो आप स्वस्थ भी हो जायेंगे और लम्बे समय तक स्वस्थ भी रहेंगे।
आनंद का अभिलाषा ही स्वास्थ्य है।
3. आप जिम्मेदारी से मुक्त हों -
अपने जिम्मेदारी को निभाना भी एक आनंद है और जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना परम आनंद। जीवन के जिम्मेदारी से मुक्त हुआ जा सकता है यदि मोह और लोभ अपने बस में हो।
अधिकतर लोग मोह के कारण जिम्मेदारी का बोझ लिए मर जातें हैं।
हमें अपने जिम्मेदारी को समझना चाहिए और उसकी एक सीमा तय करना चाहिए। हमें हमारे अपने बच्चों की जिम्मेदारी है...... लेकिन कब तक ?
हमारे माँ-बाप की जिम्मेदारी हमारे जीवन पर्यन्त होती है, जीवित रहने तक उनके सेवा की और उनके जीवन के बाद उनके क्रिया कर्म की।
हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है.. जो हमारी सामर्थ्य, शक्ति और विवेक की सीमा तक है।
जो जिम्मेदारी हमें आनंद को उपलब्ध नहीं होने देती वो है हमारी पारिवारिक जिम्मेदारी। हम अपने बेटा-बेटी के साथ पोता-पोती और उससे भी आगे पीढ़ी का जिम्मेदारी का बोझ लिए मरते हैं.. और यह जिम्मेदारी है भी नहीं... यह मोह है.. जो हमें आनंद से बंचित करता हैं और मोक्ष से भी।
जिसके जीवन में आनंद नहीं हैं वह मोक्ष के सम्बन्ध में विचार भी नहीं कर सकता।
4. आपका भौतिक जरुरत न्यूनतम हो-
यदि आपकी भौतिक जरुरत अधिक है तो आप कभी भी आनंदित नहीं हो सकते। जीवन के सभी अत्यावश्यक जरूरतें ईश्वर पूरा करतें हैं। हवा हमारे नाक के पास है। हमारे जीवन तक पानी मुफ्त है.. आगे का नहीं कह सकते... मोदी सरकार तक खाना मुफ्त है.. आवास भी करीब करीब मुफ्त है। न्यूनतम वस्त्र सर्दी गर्मी से बचने के लिए पर्याप्त है। आपकी जरुरत यदि इससे अधिक है तो आप जीवन का आनंद नहीं ले सकते।
इसका मतलब ये नहीं है की मैं विलासी जीवन के विरोध में हूँ। मुझे अच्छे मकान में रहना, अच्छे और महंगे होटल में खाना खाना, रंग विरंग का डिजाइनर वस्त्र पहनना, महंगे जुते, महंगे चश्मा, बड़ी गाड़ी में घूमना, हवाई यात्रा करना, देश विदेश घूमना इत्यादि अत्यंत पसंद है।
यदि यह सहुलियत और बिना प्रयास से उपलब्ध हो तो ।
मैं इन विलासी वस्तुओं के लिए प्रयास नहीं कर सकता हूँ। मैं अपने जीवन में अपने रहने के लिए एक ढंग का घर नहीं बना पाया।
मेरे लिए आनंद का विषय ये है कि मैं इन विलासी वस्तुओं के बगैर भी उतने ही आनंद से रह सकता हूँ और कभी कभी इससे भी अधिक आनंद से... ईश्वर और मोदी जी द्वारा प्रदत सुबिधाओं के साथ।
इसे आप मेरा आत्मप्रसंसा मत मानिये। इसका कारण ये हो सकता है कि मैं अपने जीवन में कई बार अत्यंत कठिनाई के दौर से भी गुजरा हूँ और मैं कभी भी न परेशान रहा... न उदास... और न दुखी।
आनंद मेरे जीवन के साथ हमेशा रहा। विलासी वस्तएं आयी और चली गई.. फिर से आ गयी। मैं ऐसा मानता हूँ कि फिर से जा सकती है.. लेकिन मेरा आनंद जो आज तक मेरा साथ नहीं छोड़ा है, मुझे लगता है वह कभी नहीं छोड़ पायेगा। ये आनंद मेरा साथ नहीं छोड़ता या मैं आनंद का साथ नहीं छोड़ता ये बात निश्चय रूप से नहीं बता सकता हूँ।
जीवन के अंतिम पड़ाव पर परमानन्द के खोज में हूँ।
5. आपका रूचि आध्यत्मिक हो -
आध्यात्मिक रूचि का सबसे खास बात ये है कि दुनियां के सभी व्यक्ति अपने जीवन काल में चाहे जैसा भी रहा हो मरते समय आध्यात्मिक हो जाता है। जब मृत्यु एकदम सामने आ जाये, सांसे अपना सम्बन्ध तोड़ रहा हो...किसे अपना बेटा-बेटी या दुकान-मकान याद आएगा।
यदि मरने से थोड़ा दिन पहले ये पक्का यकीन हो जाय कि मरना पड़ेगा ही.. तो हमें थोड़ा तैयारी का समय मिल जाता है। हम एक साधारण नौकरी के लिए कितनी तैयारी करते हैं 20-25 वर्ष लगा देते हैं। शादी कि कितनी तैयारी करते हैं।
हम यदि मरने की भी थोड़ी तैयारी कर ले तो शायद मरना आसान हो जाय और आसान नहीं भी हुआ तो अपने को लगेगा कि हमने तैयारी तो की थी। तैयारी के बाद भी कई लोगों को नौकरी नहीं लगती कम से कम मन में संतोष तो होता है कि हमने तैयारी की थी ।
मरने की तैयारी आध्यात्मिक रूचि है और इसे 60 वर्ष के बाद जरूर शुरू कर देना चाहिए।
अगले भाग में चर्चा करेंगे कि मरने कि तैयारी कैसे करें ?
आप मेरे लेख को बहुत ध्यान से पढ़तें हैं। आपका अभिनन्दन करता हूँ।
आभार
सोहन कुमार
घनश्यामपुर, चातर
24.09.23

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