3. बच्चों के आगमन की तैयारी (भाग-1)
बच्चा जीवन का एक ऐसा उपहार है जो आपके जीवन को सार्थकता प्रदान करता है, और यह प्रकृति के नियम का अनुशरण है। बच्चे के आगमन के तैयारी में क्या करे ?
हम साधारण-साधारण सी बात के लिए भी तैयारी करते है, हमें यदि घर से बाहर निकलना हो तो हम तैयारी करते है, कौन सा कपडा पहना जाये और कौन से जुते, शादी या बारात में जाना हो तो तब तो बात ही अलग है। हम खाना बनाने एवं खाना खाने की भी तैयारी करते है, परीक्षा और इंटरव्यू की तैयारी तो करते ही है।
हम छोटी छोटी बातों की तैयारी बड़े लगन से करते है लेकिन जीवन के बड़े बड़े मुद्दे कि तैयारी सावधानी पूर्वक नहीं करते है जैसे, शादी के कपडे, गहने, बाराती के मीनू या मंडप को सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, लेकिन बिना दहेज़ का बहु लायें जो जीवन को सजा दे, इस सम्बन्ध में विचार ही नहीं करते। हम बुढ़ापे की तैयारी नहीं करते और मृत्यु की तैयारी तो बिलकुल नहीं करते जो अवश्यम्भावी है , और परम सत्य भी।
चलिए यहाँ बच्चों के आगमन कि तैयारी करते है-
1. शादी जल्दी कीजिये-
जल्दी से मेरा मतलब बाल विवाह नहीं है, जल्दी से मेरा मतलब है 18 से 25 वर्ष के अंदर, 25 वर्ष से ज्यादा देर मत कीजिये। अपने जीवन के समय की गणना कीजिये, यदि जीवन की आयु 70 वर्ष माने, और आप 25 वर्ष में अपनी शादी करते हैं और 30 वर्ष में आपको बच्चा हो जाता है I 30 वर्ष लगेगा उस बच्चे को अपने पैरों पर खड़ा होने में, और उस समय आप 60 वर्ष के होंगे । यह एक आदर्श स्थिति है I आपके पास 10 प्रभावी वर्ष बचे हुए है, अपने बुढ़ापे कि तैयारी करने के लिए। और बाद में मृत्यु की।
आजकल नवयुवक कैरियर बनाने के लिए शादी नहीं करना चाहता है, या नहीं होता है। कैरियर जीवन से बड़ा नहीं होता, बुढ़ापा अपने समय पर आ ही जायेगा और मृत्यु भी, उसे आपके कैरियर का परवाह नहीं।
शादी शरीर का जीव विज्ञानं है, अर्थशास्त्र नहीं, शादी का सम्बन्ध आयु से है, कैरियर से नहीं। 18 वर्ष के बाद आप शादी के योग्य हो जाते है। यदि आप जीवन के सभी पहलुओं का आनंद लेना चाहते है तो सबसे पहले ये मान लीजिये कि यह जीवन अनंत कल तक के लिए नहीं है, हमारे पास सिमित समय है, और हमें उस समय का उचित प्रबंधन करना चाहिए।
हम शादी करें और जीवन का कुछ समय बिना बच्चे का बिताये, क्योंकि बच्चे आ जाने के बाद आप पति/पत्नी को भूल जायेंगे इसलिए जीवन के कुछ शुरूआती पल बिना बच्चे के बिताये तो आनंद है।
जब बच्चे आ जायेंगे,आप दोनों एक दूसरे को देख ही नहीं पाएंगे। आप दोनों बच्चे को ही देखते रह जायेंगे, लगभग 30 वर्षो तक, जब तक वह स्वाबलंबी नहीं हो जाता और उसका शादी नहीं हो जाता।
एक बार फिर वह समय आएगा जब आप एक दूसरे को देख पाएंगे क्योंकि बच्चे आपके बीच से निकल चुके रहेंगे।
वह अपने बच्चे के आगमन के तैयारी शुरू करेगा और आपको अपने अपने बुढ़ापे की तैयारी शुरू कर देना चाहिए।
लेकिन इसके लिए समय तो चाहिए, यदि आप 65 वर्ष की अवस्था में अपने बच्चों की जिम्मेवारी से मुक्त होते हैं तो आपको अपने लिए समय नहीं मिलेगा और अंत में इस दुनिया से जाने की जल्दी रहेगी । हो सकता हैं कि इस बीच आप कुछ धन अपने लिए भी जमा कर लिए होंगे, ये सोच कर कि बुढ़ापे में काम आएगा। लेकिन उस समय ये धन आपको काम नहीं आएगा, ये भी आपके बच्चे ही ले जायेंगे, क्योंकि आपके पास ऊर्जा नहीं होगा किसी भी वास्तु के उपयोग करने का।
जीवन की योजना कुछ इस तरह बनाइये कि बच्चो के जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद भी जीवन का कुछ प्रभावी और ऊर्जावान समय बचा हो कुछ ऐसा करने के लिए जो कभी सोचा था लेकिन बच्चो कि जिम्मेवारी ने करने नहीं दिया।
प्रभावी और ऊर्जावान समय, अपने पति/पत्नी के साथ, एक बार फिर से जब बीच में बच्चा नहीं हैं।
मैं आपको अनुभव से बताता हूँ, कि शादी के शुरूआती दिनों में, बच्चा होने से पहले पति/पत्नी के संबंधों का जो अनुभव है, उससे कई गुना सुखद अनुभव तब है, जब बच्चे कि जिम्मेवारी आपके जीवन से निकल गई और आप पति/पत्नी स्वस्थ और ऊर्जावान है।
जीवन का हरेक पल आनंदमय हो सकता हैं, यदि जीवन जीने
कि तैयारी अच्छे से हो।
कृपया अपने पड़ोसी को देख कर कुछ मत कीजिये, लोग क्या करते हैं, इसे समझने की ज्यादा जरुरत नहीं है , हमें क्या करना चाहिए, विचार कीजिये, जीवन के उपलब्ध समय का विचार कीजिये उसकी गणना कीजिये, उसका प्रबंधन कीजिये, जीवन के उद्देश्य का विचार कीजिये, जीवन के बिभिन्न पहलुओं पर विचार कीजिये, अंधे दौर में हिस्सा मत लीजिये। इस जीवन की सीमा निर्धारित है।
यदि आप चाहते है कि शादी के बाद अपने पति/पत्नी के साथ बच्चा होने से पहले जीवन के कुछ रोमानी पल का आनंद ले, और बच्चों के जीवन से बिदा होने के बाद भी जीवन को कुछ नया रंग देने का क्षमता विद्यमान हो तो शादी 25 वर्ष से पहले कर लीजिये।
इस आधुनिकता कि अंधी दौर से बहार निकलकर विचार कीजिये।
2. आर्थिक योजना बनाइये-
आप चाहते है कि आपके जीवन में बच्चों का अवतार हो, अब आप अगले 25 वर्षों तक
अपने बच्चों के प्रति समर्पित हो जाइये। मैं माताओं से निवेदन करूँगा कि बच्चों के
परिवरिश में 90% हिस्सा माता
का होता है, और लगभग सारा
त्याग माताओं को ही करना होता है, इसलिए माता का
स्थान पिता से 1000 गुना बड़ा होता
है।
आज के आर्थिक युग में माताएँ भी
नौकरी करती है, परन्तु माताओं
के लिए ये आवश्यक है की वो अपने बच्चे के लिए कम से कम 21 महीने की छुट्टी ले लें, इतने समय का
उपयोग और इससे होने वाले लाभों की व्याख्या मैं आगे अध्यायों में करूँगा, लेकिन यदि आप एक ओजस्वी पुत्र को जन्म देना चाहते है तो उसके लिए आप अपना 21 महीना का पूरा समय उस पुत्र के नाम दे दीजिये I
ध्यान रखिये ये नौकरी या व्यवसाय भी आप अपने बच्चे के लिए ही कर रहें है, परन्तु इस पैसे से आप अपने बच्चे का संस्कार, बुद्धिमत्ता, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, चरित्र, सकारात्मक भावनाएँ, दयालुता, निर्मलता, क्षमाशीलता, उदारता, दृढ़ता, कर्मठता आदि नहीं खरीद सकते है। एक ओजस्वी पुत्र को जन्म देने के लिए आपको कम से कम 21 महीने का पूरा समय देना ही चाहिए।
आपको अपना आर्थिक योजना इस प्रकार बनाना चाहिए की माताओं को 21 महीने तक छुट्टी भी रहे और कोई आर्थिक कठिनाई भी ना रहे।
अधिकतर आर्थिक कठिनाइयाँ विलासिता के लालसा से उत्पन्न होती है। यह समय सादगी और संयम से रहने का है।
3. शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो जाइये :-
यदि आप मानसिक रूप से बच्चों को जन्म देने के लिए तैयार है, तो आप समझ लीजिये कि आप शारीरिक रूप से तैयार है ही, ये बात जब तक आपको कोई डॉक्टर नहीं बताएगा कि आप शारीरिक रूप से बच्चे को जन्म देने देने के लिए तैयार है, तब तक आपको यकीन होगा नहीं, इसलिए एक बार डॉक्टर के पास भी चले जाइये। यदि आपके शरीर में आयरन आदि किसी तत्व की कमी होगी तो डॉक्टर आपको बता देगा और मैं सलाह दूँगा कि शरीर के किसी तत्व की कमी के लिए दवा का इस्तेमाल नहीं कीजिये। फल और सब्जिओं में शरीर के सारे तत्व मौजूद है, अपने दिनचर्या और खान पान को सही करके अपने शरीर के सभी आवशयक तत्वों कि पूर्ति कर सकते है, डॉक्टर से जाँच करवा सकते है, दवा मत लीजिये।
एक बिना कृत्रिम दवा के प्राकृतिक फूल को खिलने दीजिये। इसके लिए ये आवश्यक है कि आप खिल उठे। अपने दिनचर्या में शारीरिक सक्रियता लाईये। योग, व्यायाम, टहलना, और घरेलू कार्यों को अपने दिनचर्या में शामिल कीजिये।
सक्रियता बहुत आवश्यक है, यदि आप एक स्वस्थ संतान को उत्पन्न करना चाहते है तो।
आपकी शारीरिक सक्रियता सिर्फ आपके शारीरिक संतुलन के लिए नहीं बल्कि आपके मानसिक संतुलन के लिए भी उतनी ही जरूरी है। और आपका शारीरिक और मानसिक संतुलन ही एक संतुलित संतान प्रगट कर सकता है।
संतान उत्पन्न करने के सम्बन्ध में आधुनिक माताओं ने एक बहुत बड़ी भ्रान्ति को पाल लिया है, वह है प्रसव पीड़ा।
यह भ्रान्ति जान बुझ कर फैलाया गया। इसी भ्रान्ति के वजह से इस दुनिया में इतने बड़े बड़े हॉस्पिटल उद्योग चल रहें है, आज सामान्य प्रसव एक सपने जैसा हो गया है।
माताओं को बच्चे को जन्म देना एक अत्यंत ही सरल, सहज, नैसर्गिक, और सामान्य प्रक्रिया है।
पीड़ा होती है, लेकिन सहने योग्य… ईश्वर कभी भी आपको अपने सहन शक्ति से अधिक पीड़ा नहीं दे सकते है।
जितनी पीड़ा देंगे उतनी सहने की शक्ति भी दे देंगे। थोड़ी पीड़ा होनी भी चाहिए, आपने कभी किसी अंडे से बच्चे को बहार निकलते देखा है…… पहले अंडा थोड़ा टूटता है…यदि उस समय आप अंडे को तोड़कर चूजे को बहार निकल लेंगे तो वह मर जायेगा...जब वह अंडे को अपने जीवन शक्ति, से खुद ही तोड़कर बहार निकलेगा, तब ही वह जीवित रह पायेगा।
सामान्य प्रसव की योजना बनाइये। आजकल योग और प्राणायाम के द्वारा भी सामान्य प्रसव कराने के विशेषज्ञ मिल जायेंगे। आधुनिक तकनीक का सहायता यदि अत्यंत आवश्यक ना हो तो मत लीजिये।
ऐसे अस्पताल का चुनाव कीजिये जहाँ आपके घर के लोगों के सामने प्रसव करवाने की अनुमति हो। अधिकतर तथाकथित अच्छे अस्पताल प्रसव के समय आपके घर के लोगों को रहने की अनुमति नहीं देंगे…. इसकी पूछताछ पहले कर लीजिये वरना नर्स और डॉक्टर मिलकर अपने लम्बे चौरे बिल के लिए बेहोश कर के, ऑप्रेशन कर देंगे…. जो बच्चे और माँ दोने के जीवन शक्ति के लिए हानिकारक है।
बच्चे को खुद ही अपने जीवन शक्ति से अंडे तोड़कर बहार आने दीजिये….. उसकी सहायता करके उसके जीवन शक्ति को कम मत कीजिये।
कोरोना के बाद से इम्युनिटी शब्द का प्रयोग बहुत बढ़ गया है। प्राकृतिक रूप से जन्म लेने वाले बच्चे का इम्युनिटी बहुत ज्यादा होता है।
कोरोना काल में भारत में मृत्यु दर इतना कम इसलिए रहा क्योंकि, हमारे यहाँ प्राकृतिक प्रसव का प्रचलन रहा है। प्रसव के लिए अस्पताल का प्रयोग बहुत हाल में शुरू हुआ जो पश्चिमी संस्कृति के नक़ल में चिकत्सा माफिया द्वारा शुरू किया गया।
कोरोना वायरस, हमें हमारे सनातन धर्म की संस्कृति, आचार-विचार, रहन-सहन, खान- पान, अभिवादन करने की शैली, प्राकृतक जीवन जीने की पद्धति, इत्यादि को अंतराष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया है। हम मूर्खों की तरह पश्चिमी शैली को अपना कर अपने को एडवांस समझते थे।
माताओं से मैं विनती करता हूँ कि थोड़ी पीड़ा सहिये और वह आपकी सहन शक्ति की सीमा में ही होगी, ईश्वर की रचना पर भरोसा कीजिये। जरा सोचिये, पीड़ा आपके सहन शक्ति से अधिक कैसे होगी ?
थोड़ी सी पीड़ा सहने के लिए जीवन भर के पीड़ा का बोझ अपने सर पर मत लीजिये।
प्राकृतिक प्रसव की ठोस योजना बनाइये। एक स्वस्थ संतान को जन्म देकर पुरे जीवन संतोष के अनुभव का आनंद लीजिये। अपने बेहोश शरीर से बच्चे को इस संसार में मत लाइए। अपने होशो हवास में उसका स्वागत कीजिये।
मुझे पता नहीं, कितनी माताएँ हमारे इस धारावाहिक किताब को पढ़ रही है, इसलिए मैं आपसे आग्रह करूँगा कि आप अपने महिला मित्र एवं सम्बन्धिओं को यह लेख जरूर भेजें। हो सकता है कि उनका भला हो जाये।
बच्चों के आगमन की तैयारी का यह अध्याय पूरा नहीं हुआ। तैयारी महत्व का विषय है।
अगले शनिवार को फिर मिलेंगे इसी अध्याय के चर्चा को आगे बढ़ने के लिए रात को 9 बजे।
आभार
सोहन कुमार
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05,12.2020
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