28 नवंबर 2020

अपनेँ बच्चों की परिवरिश कैसे करें (भाग 2)

 2. भुमिका

मैंने सुना है कि मछली पानी के बेग में अपना अंडा छोड़ देती है, और यदि किसी कारण से उस मछली की मृत्यु हो जाय, तो वे सारे अंडे की मृत्यु हो जाती है, अर्थात मछली अपने अंडे को अपने ध्यान (याद) से पालती (सेवती) है।

आधुनिक मनुष्य को छोड़कर बाकि सभी जीव की माताएँ अपने बच्चों का ध्यान रखती है। आधुनिक माताएँ अपने बच्चों के पालने के लिए किराये की बाई रख लेती है, क्योंकि वे ऐसा मानती है की उनके पास इससे अधिक मह्त्व के काम है, बच्चों को तो बाई भी थोड़े पैसे देकर पाल देगी, हमारे पास अधिक पैसे कमाने की क्षमता है।

संसार का कौन सा ऐसा काम है जो आपके बच्चो को पालने से अधिक मह्त्व का है ? आखिर में आप पुरे जीवन, अपने बच्चों को पालने से अधिक और करते क्या है ? बच्चो के लिए थोड़े पैसे रख जाते है जिसे आपने उसे पालने के समय को बचा कर कमाया था।

मत रखिये अपने बच्चो के लिए पैसा, उसे अपना समय दीजिये, और कुछ समय तक तो अपना पूरा समय दीजिये। आपका बच्चा नेहाल हो जायेगा और आप भी।

एक माता-पिता यदि चाह ले कि उसे एक श्रेष्ठ संतान को जन्म देना हैऔर चाहता भी हैकौन माता पिता श्रेष्ठ संतान नहीं चाहता है ? लेकिन संतान को श्रेष्ठ कैसे बनाया जाये इससे पहले ये सोचना होगा कि खुद को कैसा बनाया जाय।

आप अपने जीवन का निर्माण ठीक तरीके से कर सकते है या यदि अभी तक आप ठीक रस्ते पर नहीं थे तो कोई बात नहीं, अभी से सुधर जाइये क्योंकि अब आप एक माता-पिता बनने वाले है, या बन चुके है, अब आपकी जिम्मेवारी बड़ी है।

याद रखिये आप खुद को श्रेष्ठ बनाये बगैर अपने बच्चे को श्रेष्ठ नहीं बना सकते है। आप खुद को श्रेष्ठ बना सकते है I संसार के हरेक मनुष्य के पास इतनी समझ है कि वह कहाँ गलत है और कहाँ सही, जो गलत है उसे छोड़ दीजिये, क्योंकि अभी आपको समझ है, आपके बच्चे को समझ नहीं है, आप जान बुझ कर प्रयास करके गलतिओं को छोड़ सकते है, आपका बच्चा बिना प्रयास का ही उसे छोड़ देगा।

आप जिन सूत्रों के सहारे अपने जीवन में शांति और श्रेष्ठता को प्राप्त करेंगे वही सुत्र आपके बच्चों के लिए अनायास अवसर बन जाता है।

आप किसी को कुछ बना नहीं सकते आप सिर्फ अवसर दे सकते है।

आप खुद को ना बदलकर यदि सिर्फ बच्चों को बनाएंगे, तो असफल हो जायेंगे। किसी को सीधे सीधे कुछ बना देना एकदम असंभव है। हम अपने बच्चों के लिए जो कुछ भी कर पाएंगे वह परोक्ष रूप से ही कर सकते है, एक वातावरण देकर, एक अवसर देकर।

हम किसी को भी अपनी मर्जी से किसी खास दिशा में ले जाना चाहे, तो चाहे वह छोटा बच्चा ही क्यों ना हो, उसका अहंकार और अभिमान हमारे विरोध में खड़ा हो जायेगा। कोई भी घसीटा जाना पसंद नहीं करता है, छोटा बच्चा भी नहीं। वह इस बात का विरोध करेगा। यह उसे आक्रमण जैसा लगेगा और यह आक्रमण ही है । इस समय जब वह बच्चा है, हो सकता है कि आपके डर से वह आपका बात मान भी ले, लेकिन जो बात उसके आत्मा को मंजूर नहीं होगा वह उसके जीवन का हिस्सा नहीं हो सकेगा ।

आप जिस जिस बात के लिए मना करेंगे, उसमे उसका आकर्षण हो जायेगा, यह बात एकदम स्वाभाविक है, और आप जिस बात को करने का दबाब बनाएंगे उसका वह विद्रोह करेगा यह बात भी स्वाभाविक है।

हमने बचपन में एक सच्ची कहानी सुनी थी, आपने भी सुनी होगी। फ्रायड एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक हुए वे अपने पत्नी और बच्चे के साथ पार्क में घुमने गए, पार्क बड़ा था, शाम को पत्नी को ध्यान आया कि बच्चा साथ में नहीं है। पत्नी घबराई तो फ्रायड ने अपने पत्नी से पूछा कि तुमने उसे कहीं जाने से मना तो नहीं किया था। उनकी पत्नी ने बताई कि हमने उसे झील के किनारे जाने से मना किया था। फ्रायड ने कहा कि पहले वहीँ चलते है 99% तो उसे वहीँ होना चाहिए और वह वहीँ पाया गया।

माँ-बाप जिस रास्ते पर जाने से रोकते है, वह ज्यादा आकर्षक हो जाता है। माँ-बाप जिस रास्ते पर उसे ले जाना चाहेंगे उसका अहंकार उसके विरोध में खड़ा हो जायेगा।

तब आखिर उपाय क्या है ?

आप जिस दिशा में बच्चों को ले जाना चाहते है, आप अपने जीवन को उस दिशा में ले जाइये, आपके जीवन कि छाया, आपके जीवन का प्रभाव, आपके जीवन का आभा, बहुत अनजान रूप से आपके बच्चों को प्रभावित करेगा।

यदि आप अपने बच्चे को धार्मिक और अंतर्मुखी बनाना चाहते है तो पहले आप अभ्यास शुरू कीजिये। यदि उसे आप कर्मठ और ईमानदार बनाना चाहते है तो अपने में कर्मठता और ईमानदारी लाइए।

आप अपने बच्चे को जो भी बनाना चाहते है उसकी एक सूची बना लीजिये और उसे अपने जीवन में उतरना शुरू कीजिये। आप जिस तरह के बच्चे कि कल्पना करते है, पहले उसे आपको बनना होगा।

आपके उपदेश और आपके आदेश, बच्चे पर कोई काम नहीं करेगा, यदि ऐसा होता तो संसार के सारे बच्चे अच्छे होते क्योंकि सभी माँ-बाप अपने बच्चे को अच्छा उपदेश ही देतें है, लेकिन उसका कोई मूल्य नहीं है।

आपके सिर्फ उसी बात का प्रभाव पड़ेगा जो आप स्वयं है। यदि आप ईमानदार है तो आप अपने बच्चे को बता सकते है कि मैं ईमानदार हुँ और मुझे इसमें शांति का अनुभव होता है। आपका बच्चा समझ जायेगा, नाटक कीजियेगा तो नहीं समझेगा, इसे भी अच्छी तरह समझ लीजिये। सिर्फ यही बात नहीं की वह आपके झूठ को नहीं समझेगा….अलग से वह झूठ बोलने की कला भी सीख लेगा।

अपने बच्चों को उपदेश और आदेश देने से बचिए। अपने जीवन के वास्तविक अनुभव बताइये, यदि कोई कमी है, वो भी बता दीजिये, उस कमी से जो आपको नुकसान हो रहा है, वो भी बता दीजिये। आप आदर से उस कमी को अंगीकार नहीं करने का सलाह दे सकते है। यदि आप आदर से सलाह देंगे तो हो सकता है की वह आपके सलाह को मान भी ले।

आदर बहुत जरूरी है। आप सोचते है की बच्चे को आपको आदर करना चाहिए, लेकिन वह आदर करना सीखेगा कैसे ? और आदर को, बिना आदर दिए नहीं पाया जा सकता है। आप किसी को कुछ भी दे दीजिये, अपनी सारी सम्पति दे दीजिये और निरादर कर दीजिये, आपको आदर नहीं मिलेगा। आदर सिर्फ आदर के बदले ही पाया जा सकता है, दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं।

छोटे बच्चे को आदर की जरुरत प्यार से अधिक है।

एक तो आदर पाने के लिए, दूसरा आदर की भावना को समझाने के लिए और सबसे ज्यादा जरूरी ये है की जिसको हम आदर करते है उसे ही हम अपने ह्रदय के ज्यादा निकट ला पाते है।

यदि आपका बच्चा बोलने और थोड़ा बहुत समझने लायक हो गया है तो आप अपने जीवन के कठिन से कठिन समस्या का समाधान उससे पूछिए, कभी कभी उसका उत्तर बहुत लाभदायक होगा। उसका सम्मान बढ़ता है और आत्मविश्वास भी। दोस्त बनिए, अभिभावक की जरुरत नहीं है।

आदर में प्यार से अधिक आत्मीयता है। प्यार में लापरवाही भी हो सकती है, आदर में एक संजीदगी होती है। प्यार में आप उसे नासमझ भी समझ सकते है, आदर में आप उसे ज्यादा जबाबदेह होने की प्रेरणा देते है।

बच्चों को बहुत आदर, बहुत सम्मान देना जरूरी है। वो अभी उगता हुआ सूरज है, असीम संभावनाओं से भरा हुआ। आप अपने जीवन के सीमाओं का निर्धारण कर चुके है। उस असीम का सम्मान कीजिये।

आदर पूर्वक, प्रेम पूर्वक, और खुद के व्यक्तित्व के परिवर्तन द्वारा आप अपने बच्चे के जीवन में परिवर्तन ला सकते है।

यदि आपका बच्चा आपको ध्यान और पूजा करते हुए देखेगा तो वह भी इस क्रिया को जानना चाहेगा।

वह यदि आपको छोटे मकान और कम आमदनी में भी ख़ुशी और प्रेम पूर्वक रहते हुए देखेगा तो संतोष की भावना को वह अनजाने ही ग्रहण कर लेगा।

जो माँ-बाप प्रार्थना, ध्यान और मौन का अभ्यास नहीं करते उनके बच्चे के जीवन में मौन और शांति नहीं हो सकता। जो बच्चे माँ-बाप के बीच कलह, विवाद, उदासी और असंतोष देखेंगे वह आपके किस उपदेश का पालन करेगा।

बच्चों को बदलना हो तो खुद को बदलना जरूरी है। यदि बच्चों से प्रेम है तो खुद को बदल लेना बहुत जरूरी है।

जब तक आपको कोई बच्चा नहीं था आपकी कोई जिम्मेवारी नहीं थी, अब आपके ऊपर एक बड़ी जिम्मेवारी आ गयी है, अब आप जो भी करेंगे उसका परिणाम उस बच्चे को भुगतना पड़ेगा।

बच्चे को पैदा करना बहुत आसान है, लेकिन ठीक अर्थों में माँ-बाप बनना बहुत कठिन है। जो व्यक्ति किसी को बदलना चाहता हो उसे अपने बदले बगैर दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

आप ऐसा मत सोचिये की आपको अपने बच्चों के परिवरिश के लिए आपको उसके साथ रहकर पूजा, पाठ या ध्यान का नाटक दिखाना है। आप कहीं रह सकते है, आपका बच्चा कहीं रह सकता है, आपके आचरण का छाया, उसकी आभा और उसका प्रभाव कहीं से भी आपके बच्चे के ऊपर पड़ेगा ही।

ऐसा नहीं है आप अपने बच्चे से छुपकर शराब पी ले और सामने में माला जाप करने से काम बन जायेगा। वह आपसे भी बड़ा लोमड़ी बन जायेगा। जीवन के सरलता और सच्चाई में ही जीवंतता और प्रभाव है। आपको प्रभाव डालने या प्रभावित करने का जरूरत नहीं है, आपको प्रभावशाली बनने की जरुरत है।

आपके व्यक्तित्व कि छाया और उसकी आभा, अनायास उसके जीवन को प्रभावित करेगा। बच्चे आपके शब्दों से नहीं बल्कि आपके अन्तः करण से प्रेरणा लेती है।

बच्चों के परिवरिश के लिए धन का कितना महत्व है ?

अक्सर लोग सोचते है कि बच्चों के परिवरिश के लिए धन बहुत आवश्यक होगा। मैं आपको प्रामाणिक तौर पर ये बताना चाहता हूँ कि बच्चों के परिवरिश के लिए धन कि कोई आवश्यकता नहीं है, इसे मैं प्रामाणिक तौर पर इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह मेरे व्यक्तिगत जीवन का अनुभव है।

मुझे काफी लम्बे समय तक लगभग 5-6 वर्षों तक, अपने और अपने बच्चों के भोजन को जुटाने के लिए सिर्फ मेहनत ही काफी नहीं था, प्रार्थना भी करना पड़ता था। आप भोजन शब्द से कोई अलंकारिक अर्थ मत लगा लेना, मैं चावल, दाल और रोटी की ही बात कर रहा हूँ। मैं वर्षों तक सिर्फ भोजन के लिए दिन भर काम करने के अतिरिक्त सुबह शाम प्रार्थना किया करता था।

मेरी प्रार्थना हर दिन सुन लिया जाता था। हमने कभी भूखे रहने की त्रासदी नहीं झेला, लेकिन मेरे पास कल के लिए भोजन नहीं हुआ करता था।

मुझे काम चोर भी नहीं कहा जा सकता था। परस्थिति आपको विवश कर सकती है, लेकिन आपके अनुमति के बगैर वह आपको वश में नहीं कर सकती, और यदि आप अपनी विवशता में भी अपने वश में हैं तो यह परिस्थिति आपके बच्चों के लिए अवसर है। आप यदि अपने वश में हैं, तो आपके बच्चे अपने वश में रहना अनायास सिख लेंगे।

महँगे पुब्लिक स्कूल की कोई जरुरत नहीं है, मैं आपको बताना चाहूंगा कि मेरे बच्चे सरकारी स्कूल से दसवीं पास किया, जहाँ मुझे सालाना 500 रुपया फी देना होता था। मुझे इस बात का पुरे जीवन में कभी भी मलाल नहीं रहा कि मैं अपने बच्चे को महँगे विद्यालय में नहीं पढ़ा पाया। मैं उस समय भी प्रसन्न था और प्रसन्नतापूर्वक पूरी क्षमता और ईमानदारी से मेहनत कर रहा था और उससे मिलने वाले धन को प्रसन्नतापूर्वक व्यय करता था।

मेरे पास गलत तरीके से पैसे प्राप्त करने के साधन हमेशा रहा है, लेकिन अपने बच्चों के परिवरिश के दौरान मैंने कभी भी गलत तरीके से पैसे अर्जित नहीं किया। मेरा गलत व्यव्हार मेरे बच्चों के संस्कार को प्रभावित करेगा इस डर से मै संयमित रहा।

मैंने जब से अपने बच्चों के परिवरिश का जिम्मा संभाला, एकदम जन्म से नहीं संभाला, लगभग 5 वर्ष मेरे माता पिता ने ही मेरे बच्चों को संभाला और मुझे भी संभाल रहे थे।

जिस दिन से मैंने अपने बच्चों को संभालना शुरू किया, मैंने एक विद्यालय खोला जिसमे लगभग 100 बच्चे थे। मेरी जिम्मेवारी सिर्फ मेरे दो बच्चे नहीं, बल्कि वे 100 बच्चों थे, जिसे मुझे जीवन का दिशा दिखाना था।

मेरी दशा ऐसी थी कि एक आम समाज के वयस्कों में जितने भी दुर्गुण हो सकते है, मुझमे वह सब मौजूद था। मैं नियमित शराब पिता था, सिगरेट पिता था, तम्बाकू खाता था, नियमित मांसाहार करता था। परन्तु मैं चाहता था कि मेरे बच्चे ऐसा नहीं करे I मैं 27 दिसंबर 1995 को अपने विद्यालय का उद्घाटन किया था और 26 दिसंबर 1995 को अंतिम बार शराब और सिगरेट का सेवन किया। बाद के दो वर्षों में मांसाहार को छोड़ दिया। उस समय तक एक तम्बाकू खाना नहीं छोड़ पाया, इसका कारण ये भी था कि तम्बाकू को मैं बहुत हानिकारक नहीं मानता था, इससे सिर्फ दाँतों के ख़राब होने कि संभावना थी, जो ख़राब हो भी गयी, मेरे उतने ही दाँत अच्छे है जो आप फोटो में देखते है, काम के कोई दाँत नहीं बचे।

मैं अपने बच्चों को बताया करता था कि मुझे डर है कि तुम तम्बाकू खाना सीख लोगे, यदि सीख लोगे तो मैं मना नहीं कर पाऊंगा, लेकिन बाद में तुमको तकलीफ होगा, यदि ना सीखो तो अच्छा। मेरे प्रार्थना को मेरे बच्चों ने स्वीकार किया।

आदर पूर्वक, प्रेम पूर्वक, और खुद के व्यक्तित्व के परिवर्तन द्वारा आप अपने बच्चे के जीवन में परिवर्तन ला सकते है।

याद रखिये आप खुद को श्रेष्ठ बनाये बगैर अपने बच्चे को श्रेष्ठ नहीं बना सकते है।

बच्चों को बदलना हो तो खुद को बदलना जरूरी है। यदि बच्चों से प्रेम है तो खुद को बदल लेना बहुत जरूरी है।

आभार

सोहन कुमार

अगले शनिवार रात 9 बजे अगला अध्याय लेकर फिर से मिलेंगे।

मैं चाहता हुँ कि इस पूरी धारावाहिक को अपने मित्रों एवं ग्रुप में अधिक से अधिकशेयर करे।

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28.11.2020



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