21 नवंबर 2020

अपनेँ बच्चों की परिवरिश कैसे करें ? (भाग-1)

 विषय सुची

1. सोहन कुमार की ओर से दो शब्द।

2. भूमिका

3. बच्चों के आगमन की तैयारी

4. गर्भ धारण से बच्चों के जन्म तक (गर्भ संस्कार)

5. प्रथम दिन से 1 वर्ष तक

6. 1 वर्ष से 5 वर्ष तक

7. 5 वर्ष से 10 वर्ष तक

8. 10 वर्ष से 15 वर्ष तक

9. 15 वर्ष से 20 वर्ष तक

10. 20 वर्ष से 25 वर्ष तक

11. 25 वर्ष से 30 वर्ष तक

12. 30 वर्ष से 35 वर्ष तक

13. 35 वर्ष से 40 वर्ष तक

14. 40 वर्ष से 45 वर्ष तक

15. 45 वर्ष से 50 वर्ष तक

16. 50 वर्ष वर्ष के बाद

1. सोहन कुमार की ओर से दो शब्द।

इस पुस्तक का शीर्षक एक प्रश्न है, कि हम अपनेँ बच्चों की परिवरिश कैसे करे ?

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए मैं कितना प्रामाणिक व्यक्ति हूँ ? यह भी एक प्रश्न ही है।

मैं आपको बताना चाहता हूँ की यह मेरी जीवन यात्रा है ओर अधिकतर सामान्य लोग अपने जीवन में अपने बच्चों के परिवरिश से अधिक और कर ही क्या पाते है ? सामान्य लोगों के जीवन का मुल उद्देश्य तो यही होता है।

यह लेख एक प्रार्थना है जो मैं आपसे कर रहा हूँ।

अपने बच्चों को आप सँवार सकते है, मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में भी। थोड़ी समझ, थोड़ा अंतर्मुखी होना ओर अवलोकन करना….. स्वयं का…..परिस्थितिओं का…. अपने बच्चों का…..प्रकृति का।

संसार के सभी जीव अपने बच्चों का परिवरिश करते है। कैसे ? प्रकृति से आप बहुत कुछ सिख सकते है, एक मनुष्य को छोड़कर पूरी प्रकृति अपने नैसर्गिक ओर सुन्दरतम रूप में आपको सन्देश दे रही है।

संसार के समस्त जीवों का सबसे महान उत्तरदायित्व अपने संतति को विकसित करना है और मनुष्य का ये खास उत्तरदायित्व है कि वह न सिर्फ संख्या से बल्कि गुणवत्ता और बोधित्व के दृष्टि से भी अपने संतति को अधिक विकसित करे, क्युँकि ईश्वर ने सिर्फ मनुष्य को ही सोचने-समझने और स्वयं को विकसित करने और अपने संतति को और भी अधिक विकसित करने का योग्यता प्रदान किया है।

हम जीवन के कई क्षेत्रों जैसे विज्ञान, तकनीक, आर्थिक, भोग, विलासिता आदि में काफी उन्नति किये हैं, और करते ही जा रहे है, परन्तु हम जीवन के कई महान क्षेत्रों जैसे जीवन मूल्य, मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास, जैसे क्षेत्रों में अवनति कर रहे है और करते ही जा रहे है।

प्राचीन समय में हमारे पास अपने बच्चों को परिवरिश करने की अत्यंत उन्नत पद्धति प्रचलित था, गुरुकुल था, जो बच्चों के मानसिक, शारीरिक, शैक्षणिक, बौद्धिक, और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक था।

दुर्भाग्य से अब वो संस्थान नहीं बचा लेकिन सौभाग्य से हमारी बौद्धिक शक्ति आज भी हमारे पास है, हम थोड़ी सोच-विचार करके अधिक विकसित संतति को उत्पन्न कर सकते है।

मुझे इस बात का दृढ़ विश्वास है कि शिशु बिलकुल गीली मिट्टी कि तरह है, हम उसे जो भी आकर देंगे वह वही आकर ग्रहण करेगा इस बात में मुझे जरा भी संदेह नहीं है। हम के अंतर्गत सिर्फ माता पिता नहीं है, हम के अंतर्गत माता-पिता के अतिरिक्त उसके परिवार के अन्य सदस्य जैसे, दादा-दादी, चाचा-चची एवं अन्य सदस्य, उसके घर में काम करने वाले बाई, ड्राइवर, सब्जी देने वाला, दूध देने वाला, अखवार देने वाला, उसके बिल्डिंग का गार्ड, उसका पड़ोसी, उसका दोस्त, उसका शिक्षक, उसका विद्यालय, उसका पूरा सामाजिक वातावरण उसको आकर देने में सहयोगी है।

परन्तु उसके माता पिता का दायित्व सबसे अहम् है, और यदि उसके माता पिता थोड़ी सी सावधानी रखे तो वह ख़राब से ख़राब सामाजिक परिवेश में भी अपने बच्चों को उन्नत संस्कार दे सकता है, परन्तु कैसे ? यही मैं इस पुस्तक में निवेदन करने का प्रयास करूँगा।

हम अपने जीवन के लगभग 30 वर्षों (बच्चा के जन्म से लेकर उसे स्वाबलंबी होने तक) को सिर्फ अपने बच्चों को परिवरिश करने के लिए ही जीते है। यदि 15 वर्षों को बचपना के लिए और अंतिम के 15 वर्षों को बुढ़ापे के लिए छोड़ दिया जाय और पूरी आयु को 70 वर्ष माने तो हम अपने जीवन के लगभग 75% प्रभावी समय बच्चों के फिक्र में ही जीते है। कुछ लोगों को तो मरने के अंतिम दिन तक बच्चों कि फिक्र बनी रहती है।

हम बच्चों के फिक्र करने में सावधानी नहीं बरत पाते है, क्योंकि हम आत्मीयता से अधिक मोह और लोभ से घिरे रहते है, इस विषय में हमें प्रकृति के अन्य जीवों से शिक्षा लेनी चाहिए।

मनुष्य को छोड़कर सभी जीव अपने बच्चो का तब तक परिवरिश करता है, जबतक वह स्वाबलंबी न हो जाय।

मनुष्य को छोड़कर सभी जीव अपने बच्चों का परिवरिश बिना अपने बुढ़ापे के सहारे के आशा के, निःस्वार्थ भाव से, कर्म योग की तरह करता है।

एक पशु पक्षी अपने बच्चो के लिए जितना आक्रमक हो सकता है, मनुष्य में न उतनी सम्बेदनशीलता है, और न ही उतना साहस और धैर्य। हम तो अपने बच्चे को समाज के डर से नाला में फेंक सकते है। पैसे कि कमी पर जाये तो बेच भी सकते है।

बच्चों के सुरक्षा की तकनीक हमें बिल्ली और कुत्तियाँ से सीखनी चाहिए।

बच्चों को प्रशिक्षित करने की तकनीक हमें शेरनी से सीखनी चाहिए जो अपने अबोध बच्चों को गीदर के झुण्ड में अकेला भेज देती है और तब तक सहायता के लिए नहीं जाती जब तक वह पूरी तरह लहूलुहान नहीं होता। वह अपने बच्चों को अपने से भी बड़े जानवरों को वश में करने की तकनीक सिखाती है।

अपने बच्चों को सुख और आराम देने की कला हमें पक्षिओं से सीखनी चाहिए जो कितनी धैर्य पूर्वक अपने अण्डों को सेवती है।

लोमड़ी से कुछ ना सीखे तो अच्छा, और देखिये कुत्ते, बिल्ली या पक्षी हमारे बीच होता है, हमारे घर में होता है लेकिन लोमड़ी हमारे घर में नहीं रह सकता क्योंकि वह अपने बच्चों को चालाकी तो सिखाती है, लेकिन समझदारी नहीं सिखाती, जो उसे समाज से दूर कर देती है।

हमें अपने बच्चों के सार्थक परिवरिश के लिए कर्मनिष्ठता, निर्लोभ, निर्मोह, सम्बेदंशीलता, साहस, धैर्य, नैसर्गिक आत्मीयता और प्रेम कि आवश्यकता है।

इस पूरी किताब में मैंने सिर्फ लिखने की सुबिधा की लिए कहीं-कहीं पुत्र शब्द का प्रयोग किया है। संतान चाहे पुत्र हो या पुत्री, जड़ा भी भेद नहीं है परन्तु यदि आप मुझे भेद करने का दबाब बनाएंगे तो मैं पुत्री के स्थान को पुत्र से ऊपर रख दुँगा।

हमारा समाज पुरुष प्रधान उस समय था, जब शारीरिक बल का मह्त्व था। राजाओं को स्वयं युद्ध के मैदान में युद्ध करने के लिए जाना होता था। इसलिए राजगद्दी पुत्रों को सौपा जाता था। आज के समय में शारीरिक बल का कोई मह्त्व नहीं रहा, और स्त्री और पुरुष में यदि….. स्त्री पुरुष के तुलना में किसी क्षेत्र में कमजोर है, तो वह सिर्फ और सिर्फ शारीरिक बल है, अन्यथा स्त्री हर क्षेत्र में पुरुष के तुलना में अधिक सक्षम है, चाहे वह लगनशीलता हो, कर्मठता हो, एकाग्रता, दयालुता, निर्भयता, क्षमाशीलता, उदारता, दृढ़ता, सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता, संयम, अनुशासनहर क्षेत्र में स्त्री अधिक सक्षम पायी गयी है।

आप इस ग़लतफ़हमी में मत रहिये की हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है…… हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज था…….जब शारीरिक बल का समाज में स्थान था। आज हमारा समाज स्त्री प्रधान समाज बन चूका है…… जरा अपने समाज के बदलती व्यवस्थाओं पर गौर कीजिये। ऐसा होना भी चाहिए, ऐसा होने में काफी देर हो गया। हम (पुरुषों) ने जान बुझ कर स्त्रिओं को अशिक्षित रखा ताकि उसे उसके दैवी शक्तिओं का भान ही न हो। हमने उसे अबला, लज्जा और मर्यादा का पुतला बना कर रखा।

आज का प्रबुद्ध समाज लड़का एवं लड़की के परिवरिश में, उसके शिक्षा, स्वतंत्रता, एवं अन्य किसी भी क्षेत्र में भेद भाव नहीं करता है। मैं इस सामाजिक बदलाव का स्वागत करता हूँ, यह सामाजिक उन्नति का प्रतिक है। और अब लड़कियां किसी भी क्षेत्र में लड़को से पीछे नहीं रही।

हमारा विषय है " अपने बच्चों की परिवरिश कैसे करे" बिना लड़का और लड़की में भेद किये।

यह पुस्तक उनलोगों के लिए अधिक लाभदायक है, जिनके जीवन में अभी तक बच्चे का अवतार हुआ नहीं है। या जो अपने बच्चों के जीवन को सवारने में लगे हुए है। जो अपने बच्चों के परिवरिश से मुक्त हो चुके है, और इस पुस्तक को पढ़ रहे है और मुझे कोई सलाह देना चाहते है, मैं उनके सलाह का स्वागत करता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि यह किताब आपके बच्चों को सवारने में आपकी सहायता अवश्य करेगी। यह मेरे अब तक के जीवन का सबसे अहम् अनुभव है।

आभार

सोहन कुमार

अगले शनिवार रात 9 बजे अगला अध्याय लेकर फिर से मिलेंगे।

मैं चाहता हुँ कि इस पूरी धारावाहिक को अपने मित्रों एवं ग्रुप में अधिक से अधिक शेयर करे।

एक सुसंस्कृत परिवार और एक सभ्य समाज के निर्माण में आपका योगदान अपेक्षित है।

sohankumarroy.blogspot.com को subscribe कर ले।

विनीत

सोहन कुमार

21.11.2020




 

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