12 दिसंबर 2020

अपनेँ बच्चों की परिवरिश कैसे करें (भाग 4)

 3. बच्चों के आगमन की तैयारी (भाग-2)

बच्चों के आगमन की तैयारी (भाग-1) में हमने तीन विषयों पर चर्चा किया था -

1. शादी जल्दी कीजिये।

2. आर्थिक योजना बनाइये।

3. शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो जाइये।

अब हम चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।

4. बच्चों को जन्म देने का स्थान निर्धारित किजिये -

गर्भावस्था से लेकर बच्चे के जन्म से 1 साल तक अर्थात 9+12=21 महीने तक किसी भी प्रकार के यात्रा से परहेज करे इसके लिए ये आवश्यक है कि 21 महीने तक के लिए एक ऐसे स्थान का चुनाव किया जाये जहाँ निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध हो-

i) घर अपना हो -

हमारे देश में कड़ोड़ो लोगों के पास अपना घर नहीं हैं, ऐसे लोगो के प्रति मेरी गहरी सम्बेदना हैं। लेकिन यदि आपको अपना घर हैं तो 21 महीनो तक उसमे रहना कई मायने में लाभदायक हैं, एक तो किराया नहीं देना होगा और दूसरा बच्चे के जन्म को मैं ईश्वर का अवतार मानता हूँ …. जन्म तो ईश्वर ही लेते हैं….. हम उनको चालाकी सीखा कर मनुष्य बना देते हैं और कभी कभी शैतान भी।

मुख्य बात ये हैं कि जहाँ रहने में सहूलियत हो, अपनापन का अहसास हो,और प्रसन्नता बनी रहे। पुराने समय में पहला बच्चा मायके में होने कि प्रथा थीजब शादी भी जल्दी हुआ करती थी और बच्चे भी अधिक हुआ करते थे। अपने माता पिता के पास सभी प्राणी अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं।

ii) अधिकतर समय पत्नी पति के साथ में हो

यदि आप मायके में रहने का चुनाव करती हैं तो पति का साथ रहना मुश्किल होगा और शरीर के साथ रहना आवश्यक भी नहीं हैं…. साथ में रहने का ये मतलब नहीं है कि शरीर एक साथ होशरीर का बहुत मूल्य नहीं है। आत्मा एक साथ हो। आप शरीर के साथ हैंतो यह आवश्यक नहीं हैं कि आपकी आत्मा मिल ही जाय, मुझे लगता है की यदि शरीर दूर हो तो आत्मा जल्दी नजदीक पहुँच जाती है।

इस संसार के प्रेम की जितनी भी अमर कहानियाँ है, जैसे लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शीरीं-फरहाद, सोहनी-महिवाल,विल्हण-रतिलेखा आदि किसी के बीच ना शादी हुई और ना शारीरिक सम्बन्ध बना पाए।

मैं इस घटना को एक महान ऐतिहासिक भुल मानता हूँ। यदि इनकी शादी हो जाती और इनके द्वारा जो पुष्प खिलता….वह इस संसार को कुछ और बुद्ध और महावीर जैसे अवतारों का सुख देता।

बच्चे आपके प्रेम का पुष्प है। शारीरिक सम्बन्ध आवश्यक है। लेकिन वह प्रेम के भाव को आपके प्रेम से ही सीखेगा। प्रेम को शरीर से जड़ा भी सम्बन्ध नहीं है।

मैं शरीर से हमेशा दूर रहने का सलाह नहीं दूंगा लेकिन आत्मा के हमेशा करीब रहने का सलाह दूंगा। गर्व में पल रहे आपका शिशु आपके शरीर के आकर्षण को नहीं बल्कि आपके अंतरात्मा के प्रेम को अनुभव करेगा।

अक्सर प्रेम के बिपरीतार्थक शब्द घृणा को माना जाता है। मेरे समझ से घृणा हमारा ऐसा शत्रु है, जो हमें दीखता है, हमें पता है की हम घृणा कर रहे है, हमें ये भी पता है की ये गलत है। जो हमें दीखता है, उसका सामना हम आसानी से कर सकते है....... लेकिन काम वासना हमारा ऐसा शत्रु है... जो दीखता तो प्रेम की तरह है... लेकिन इसके कारण हम अपने जीवन में प्रेम के वास्तविक अनुभव से बंचित रह जाते है।

वह शत्रु जो मित्र की तरह दिखे ज्यादा खतरनाक होता है।

काम प्रेम का वह बहुरुपिया रूप है, जिस रूप से रावण ने माता सीता का हरण किया और प्रेम वह निश्चल भाव दशा है, जिस दशा में सीता माता अशोक वाटिका में श्री राम के प्रतीक्षा में रही।

असल शत्रु काम है, घृणा को आप आसानी से हटा सकते है, काम को हटाना कठिन है। प्रेम का बिपरीतार्थक घृणा नहीं काम है।

पति पत्नी के बीच प्रेम में जो सबसे बड़ी बाधा है, वह काम ही है। आप पत्नी के प्रेम को सच्चे अर्थों में उसी दिन अनुभव कर पाएंगे जिस दिन वह आपकी माता हो जाएगी। उससे पहले उस प्रेम से वासना की बु मिटेगी नहीं। ऐसा मैं सिर्फ आपको नहीं समझा रहा हूँ, ऐसा मैं अपने आप को भी समझा रहा हूँ।

राम कृष्ण परमहंस अपने पत्नी को माता स्वरुप समझती थी। जीवन के उत्तरार्ध में गाँधी जी की पत्नी भी उनकी माता हो गयी थी।

प्रेम परमात्मा प्राप्ति का मार्ग है, बिना प्रेम के परमात्मा को अनुभव नहीं किया जा सकता। जो मनुष्य का एक मात्र लक्ष्य है।

आपके प्रेम के अनुभव को आपका शिशु सहज ही अनुभव कर लेगा, जो उसके जीवन का धरोहर है।

आप सिर्फ एक शरीर को उत्पन्न नहीं कर रहे है, आप उसके आत्मा को भी प्रगट कर रहे हैआपकी भावदशाऔर आपकी मनोदशा आपके शिशु के व्यक्तित्व, चरित्र, और सौंदर्य को प्रभावित करेगा। आप एक व्यक्ति को नहीं एक संसार को प्रगट कर रहे है। हरेक व्यक्ति का एक संसार होता है, आपके शिशु का संसार कैसा होगा ? इसे बहुत कुछ माता निर्धारित करती है और कुछ-कुछ पिता।

iii) किसी बुजुर्ग एवं अनुभवी महिला का संरक्षण हो-

यदि आप मायके में हैं और माता के संरक्षण में है, तो बहुत अच्छा। परन्तु यदि आप ससुराल में हैं और सास आपको पसंद नहीं करती हैं, तब भी आप चिंता मत कीजिये कीजिये, इस समय आपकी सास आपकी माँ से बढ़कर आपका ख्याल रखेगीक्योंकि आपके पेट में उसका वंश बढ़ रहा हैं। और हमारी पितृ प्रधान संस्कृति में पितृ वंश वृद्धि को स्वर्ग का द्वार माना जाता हैं…. इसलिए इस अवस्था में आप ससुराल में भी आराम से रह सकती हैंइसकी मैं गारंटी देता हूँ। बच्चा होने के बाद आपका तिरस्कार शुरू हो जाय ये मैं मान सकता हूँ, यदि बेटी हो जाय तो और भी तिरस्कार हो जाय ये भी मान सकता हूँ…. लेकिन गर्वावस्था ससुराल में आप आराम से व्यतीत कर सकती हैं।

कुछ स्त्रियाँ अपने पति का साथ तो चाहती हैं लेकिन सास का नहीं, यह मानसिकता आपको कमजोर कर सकती हैं और कभी कभी बीमार भी।

iv) गर्ववती माता को किसी काम का कोई दबाब नहीं हो-

ऐसा स्थान चाहिए जहाँ वह बिलकुल स्वतंत्र हो, यदि जी में आये तो कोई काम कर सकती है परन्तु किसी प्रकार का उत्तरदायित्व ना हो। इसलिए इतने लम्बे समय तक काम करने वाले की उचित व्ययस्था पहले ही कर लेना चाहिए।

v) आपका पडोसी कैसा हो ?

जीवन का यह समय अधिकतर, मौन, ध्यान, स्वाध्याय, और प्रार्थना में व्यतीत करना चाहिए, जिसके लिए ये आवश्यक है कि अनावश्यक लोगों और अनावश्यक बातों से परहेज किया जाय। लेकिन ये भी ध्यान रखना होगा कि जब आपको लोगों कि आवश्यकता हो तो कुछ ऐसे पडोसी हों जो दिन या रात कभी भी आपके सहायता के लिए तत्पर हो।

vi) घर साफ सुथरा हो

घर छोटा बड़ा जैसा भी हो, उसके साफ सुथरा होने कि व्ययस्था नियमित होना चाहिए। सफाई में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, इसके अलावा घर के दीवारों पर ऐसी तस्वीर टंगी होनी चाहिए जैसे बच्चे की आप कामना करते है। आपकी आँखों के सामने हर समय ऐसी तस्वीर हो जो आप को याद दिलाये कि आप एक ईश्वर को प्रगट करने वाले है।

vii) एक वाहन चाहिए -

यदि आपके पास कोई निजी वाहन नहीं है तो कोई बात नहीं, आप किसी ऑटो या टैक्सी वाले के साथ ऐसा अनुबंध कर सकते है कि जब आप उसे बुलाये, चाहे दिन हो या रात, चाहे उसे किसी ग्राहक को छोरना पड़े, वह तुरंत आपके पास के लिए रवाना हो जाये। इसके लिए आप उसे उचित दर निर्धारित कर दे साथ में अपने हालत कि भी जानकारी दे दे, ताकि वह आपके जरुरत पर जिम्मेवारी से आपके पास पहुँच जाये। सिर्फ पैसे के लिए नहीं बल्कि आपको मदद करने के लिए भी।

एक सामान्य मनुष्य को पैसे से अधिक किसी को मदद करने अधिक आनंद आता है, यदि आप मदद माँगने में सहजता रखें।

आपने सोच विचार करके उस स्थान का चुनाव कर लिया जहाँ सब प्रकार कि सुबिधा है और वाहन भी है।

यदि आप हाल के दिनों में बच्चों के आगमन की तैयारी कर रहे है तो इस अध्याय के दोनों भाग को दुबारा पढ़े या तब तक पढ़े जब तक अच्छी तरह से समझ में ना आ जाये। आर्थिक और अन्य तैयारियाँ लोग कर लेते है, लेकिन मानसिक और भावनात्मक तैयारी में कमी होती है,ऐसा मैं अनुभव से जानता हूँ।

मानसिक और भावनात्मक तैयारियाँ सबसे अधिक जरूरी है। यही आपके बच्चे का व्यक्तित्व और चरित्र को निर्धारित करेगा।

आप इस धारावाहिक लेख को पढ़ते है, इसे आपके द्वारा और भी अधिक लोग पढ़ पाएँ, इसलिए इसे शेयर जरूर करे।

हम आपके योग्य संतान के लिए ईश्वर से निवेदन करते है।

अगले शनिवार को फिर मिलेंगे अगले अध्याय को लेकर रात को 9 बजे।

आभार

सोहन कुमार

घनश्यामपुर, बिहार दिनाँक -12.12.2020

sohankumarroy.blogspot.com  को subscribe कर ले।




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें