23 जनवरी 2021

अपनेँ बच्चों की परिवरिश कैसे करें ? (भाग 6)

 4. गर्भ धारण से बच्चों के जन्म तक (गर्भ संस्कार) (भाग-2)

आप गर्भ धारण कर चुकीं है, एक अनजान आत्मा आपके गर्भ में प्रवेश कर चूका है, वह आत्मा कौन है ? पूर्व के जन्मों में आपका उससे क्या सम्बन्ध था ? वह इस धरती पर प्रगट होने के लिए आपके गर्भ को ही क्यों चुना ? यह सारा प्रश्न अनुत्तरित होते हुए भी एक बात तय है कि किसी न किसी जन्म में उसके प्रति आपका कुछ कर्तव्य शेष रह गया था। अब आपके कर्तव्य करने का समय आ गया। आपका कर्तव्य जन्म के बाद से नहीं वह आज से ही शुरू हो गया। अभी 10-15 दिन बीत गया उसके बाद ही आप कन्फर्म हो पाए। 9 महीने कि इस चरित्र निर्माण यात्रा में आपका स्वागत है।

यह 9 महीना उस आत्मा के लिए आपके कर्तव्य का पहला और सबसे महत्वपूर्ण क़िस्त है जो आपको चुकाना है। मनुष्य के मस्तिष्क का 80% विकास गर्भ में ही हो जाता है। आप देखिये जन्म के बाद बच्चा के अन्य सभी अंगों का विकास होता है, परन्तु मस्तिष्क अपना आकार गर्भ में ही ग्रहण कर लेता है। हाथ पैर का विकास तो जन्म के बाद होता है परन्तु मस्तिष्क जो शरीर का और जीवन का सबसे महत्वपूर्ण भाग है वह गर्भ में ही विकसित हो जाता है।

जन्म लेने के बाद आप उसके शारीरिक विकास के लिए कितनी चिंता करते है, उसके खाने पिने का कितना ध्यान रखते है। जड़ा सोचिये उसके शारीरिक विकास का आपको इतनी परवाह है। तो उसके मस्तिष्क विकास के लिए कितना परवाह करना चाहिए ? बाद में आप उसे अच्छी शिक्षा और संस्कार के लिए कितना परिश्रम करते है ?

इस समय जब उसके मस्तिष्क का निर्माण हो रहा है, यह 9 महीना जिसमे 15 दिन बीत चूका है, बचा हुआ पूरा समय….. पूरी ऊर्जा….. पूरा ध्यान…. बच्चे के ऊपर लगा दीजिये, इससे अधिक संस्कारित आप उसके बाद के जीवन में नहीं कर पाएंगे।

मैं पहले के लेख में बता चूका हूँ कि यदि आप नौकरी या कोई व्यवसाय कर रहे है तो उसे 21 महीने के लिए विराम दे दीजियेउसके जमीन, मकान की चिंता मत कीजिये…. उसके पढाई लिखाई का भी चिंता मत कीजिये। उसके मस्तिष्क के निर्माण का परवाह कीजिये, उसके आत्मविश्वासी होने का परवाह कीजिये, उसका आचरण, उसका विवेक, उसका सहनशीलता, उसका उदारता, उसका चरित्र और उसके भाग्य का परवाह कीजिये। दुर्भाग्य तो सिर्फ ख़राब चरित्र से ही आ जाता है। आप उसके भाग्य का निर्माण कर रहें हैं…… तत्परता बहुत आवश्यक है।

इन 9 महीनों की चरित्र निर्माण यात्रा में अपनी एक नयी दिनचर्या बनाइये जिसमे निम्नलिखित क्रिया कलाप को शामिल कीजिये -

1. पढ़ना-

मुझे पता नहीं कि पढ़ना किसे अच्छा लगता है ? मुझे यदि ईमानदारी से पूछेंगे तो मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता, गप्प मारने के सामने भला कौन पढ़ना चाहेगा ? लेकिन मैं पढता हूँ और एक बार जब पढ़ना शुरू करता हूँ तो फिर पढ़ने में मन भी लगने लगता है। यदि आपको पढ़ने में मन नहीं लगता है तो आप बिलकुल मेरे जैसे है…. लेकिन एक बार आप पढ़ना शुरू कीजिये आपको मन लगने लगेगा। इससे भी अधिक जरूरी ये है कि किताब आपके मन को एक खास दिशा में ले जाने का उपक्रम करता है, जो इस समय आपके लिए बहुत जरूरी है।

क्या पढ़े ?

जो आपको पसंद हो….. परन्तु वह या तो धर्म ग्रन्थ होकिसी महापुरुष की जीवनी हो...या कोई भी अच्छी सोच उत्पन्न करने वाली पुस्तक।

मेरा पसंद है परम श्रद्धेय, प्रातः स्मरणीय श्री रामसुख दास द्वारा लिखित "साधक संजीवनी" यह श्रीमद्भागवत गीता पर टिप्पणी है। गीता पर हजारों लोगों द्वारा टिप्पणी लिखी गयी लेकिन इससे अधिक विस्तृत टिप्पणी किसी के भी द्वारा नहीं की गयी है। आप भी यदि इसे पढ़ना चाहती है तो पढ़ सकती है।

2. लिखना-

9 महीनो की इस चरित्र निर्माण यात्रा में मैं लिखने का आग्रह इसलिए करता हूँ क्योंकि लिखना अपने आप में कुछ निर्माण करने जैसा है, जो आपके मस्तिष्क के उर्वरकता को बढ़ाता है और आपके शिशु का भी।

लेकिन लिखें क्या ?

कविता लिखिएनहीं लिख सकती….. कोई कहानी लिखिएयह भी संभव नहींचलिए एक पत्र लिखिएरोज एक एक पत्र लिखिए…. अपने पति को लिखिएअपने पिता को लिखिए। अपने मन के भावो को लिखिए, यदि आपको लगता है की इस पत्र को भेजना नहीं चाहिए तो मत भेजिए, लिखना ही काफी है।

जब आप अपने भावो को लिखते है तो उस भाव को आपका नन्हा सा शिशु ग्रहण कर लेता है, और वह अनायास ही अपने पिता और नाना आदि बुजुर्गो के प्रति आदर के भाव से भर जाता है। आप जिसे प्यार करते है, उसे वह अनायास ही आदर करने लगेगा। लेकिन जब आप लिखेंगे तब ही वह भाव तीब्रता से आपके मन में आएगा।

आपके पास समय भी है, जीवन में दुबारा इतना समय आपको नहीं मिलेगा। लिखिए, पढ़ने की चिंता ना हो तो कुछ भी लिखा जा सकता है। अपने मन के भावो को लिखिए। यह बहुत लाभदायक रहेगा।

3. सुनना

आप जिस घर में है वहां एक मधुर संगीत या भजन आदि बजते रहना चाहिए जो आपको पसंद हो, और जब आप कुछ नहीं कर रहे है, उस समय उस संगीत पर अपना ध्यान लगाइये। आपके शिशु को संगीत से रूचि हो जाएगी। संगीत एक योग है जो मानसिक एकाग्रता के लिए रामबाण है। एक बात का ध्यान रखिए कि आपका शिशु उस संगीत को तब ही सुन पायेगा जब आप उस पर ध्यान लगाएंगे। आपका ध्यान जहाँ जायेगा आपके शिशु का ध्यान भी वहीँ जायेगा। आपके मन का भाव जैसा होगा उसके मन का भाव भी वैसा ही होगा.... बिना किसी के कारण के। आपके मन का भाव तो किसी कारण से होगा, आप खुस तब होंगे जब आपको ख़ुशी का कोई समाचार मिलेगा लेकिन आपका शिशु सिर्फ इसलिए खुस हो जायेगा क्योंकि आप खुस है। दुखी भी वह बिना किसी निजी कारण के सिर्फ आपके दुखी होने से हो जायेगा। उसके जीवन का तरंग आपके मन के साथ जुड़ा हुआ है।

यदि आपको संगीत में रूचि नहीं है तो भक्ति गीत ऐसा होता है जो संगीत का ज्ञान नहीं होने पर भी पसंद आ जाता है।

सुनने के सम्बन्ध में सावधानियाँ- ईयर फ़ोन लगा कर सुनने से बचे। खुले कानों से सुनने का चेष्टा करे। यदि आपको निजी कमरा उपलब्ध ना हो तो ईयर फ़ोन कान से थोड़ा हटा ले और आवाज को बढ़ा ले जिससे आप सुन भी पाएंगे, वह कान में घुसा नहीं रहने के कारण ज्यादा तकलीफ भी नहीं होगा और दूसरे व्यक्ति को भी कोई तकलीफ नहीं होगा।

मुझे ऐसा लगता है कि ईयर फ़ोन कान में घुसा कर सुनने से बच्चे को तकलीफ होगा। मुझे इन टेक्नोलॉजी वाले उपकरण के प्रयोग से भय लगता है खास करके शरीर के संपर्क में आने से।

संगीत का आनंद लीजिये और खुले कानों से आनंद लीजिये।

4. अपने नन्हे शिशु से बात करना

यदि आपको कोई एकांत घर मिला हुआ है तो आप अपने नन्हे शिशु से बोल कर जोर से बात कर सकते है, यदि ऐसा संभव नहीं हो तो अपने पेट के ऊपर हाथ रखिये और मन ही मन बात कीजिये। अपने शिशु से बात करना एक रोमांचकारी अनुभव है। जब आपके ३ माह गुजर जायेंगे उसके बाद से आपको अनुभव होगा कि वह आपकी बात को सुन भी रहा है और उस पर प्रतिक्रिया भी दे रहा है। आप उसके नाराजगी और ख़ुशी को अनुभव कर पाएंगे।

अपने अजन्मा शिशु से बात करते समय बरतने वाली सावधानियाँ-

A. अपने शिशु से कभी भी लेट कर बात नहीं करे। जब भी बात करे या तो बैठ कर करे या चलते चलते करे। लेट कर बात करने से वह आपके आलस्य के भावना को ग्रहण कर सकता है। जब बात करे तो पुरे उत्साह और उमंग से करे। डांटे भी, समझाए भी, पुचकारे भी और सबसे बड़ी बात सावधानी पूर्वक उसके भावना को भी समझने का प्रयत्न करे।

B. जब मन ही मन बात चल रहा हो तो अपने हाथ को अपने पेट के पास रखे।

C. कभी भी उदासी, दुःख, ईर्ष्या या द्वेष के भावना में बात ना करे। एक तो ऐसा वातावरण रखे कि इन चरित्र निर्माण यात्रा में ऐसी भावना कभी मन में आये ही नहीं और यदि कभी आ ही गया तो उस समय बच्चे के ऊपर ध्यान ना ले जाये।

D. बातें करते समय जिसे आप पसंद नहीं करते उसकी चर्चा शिशु से ना करे। उससे सिर्फ उसकी चर्चा करे जिसे आप पसंद करते है। जिसे आप पसंद नहीं करते जरूरी नहीं ही वो पसंद के लायक ही ना हो। वह आपकी कमी भी हो सकती है।

E. अंत में शिशु से कभी भी अनादर भाव से बात नहीं करे उसका आदर करे वो अभी आप से अधिक ईश्वर के नजदीक है।

5. घरों को चित्रों से सजाना-

आपका समय जहाँ सबसे अधिक व्यतीत होता है उन घर कि दीवारों को चित्रों से सजाएँ। दीवारों पर ऐसा चित्र लगाएँ जो आपको पसंद है। जो महापुरुष आपको पसंद है उनका चित्र लगाएँ, जो भगवान् पसंद है, उनका चित्र लगाएँ और उन चित्रों को कुछ समय तक लगभग 1-2 मिनट तक लगातार देखें, आपके नेत्रों के सहारे आपका शिशु भी उस चित्र को देख लेगा और आपको जो पसंद है वह वही बनने का प्रयत्न करेगा।

अपने आदर्श और अपने प्रिये का चित्र देखना आपको मनमोहक लगेगा और आपके अजन्मा शिशु को भी। आप कल्पना कीजिए और उसे समझाइये कि मैं जो चाहता हूँ वह मेरे आँखों के सामने है।

बहन, मैंने जितने छोटे छोटे प्रयोग बताया हूँ। इसे करना जरूर। यह कोई कठिन नहीं है लेकिन इसके लाभ असीमित है।

6. खाना बनाना-

यह काम आपके जिम्मेवारी में शामिल नहीं होना चाहिए, परन्तु यदि आपको अवसर है और रूचि भी है, तो आप इसे अपने दिनचर्या में शामिल कर लीजिये। खाना बनाना कोई सामान्य सा काम नहीं है। गीता में इस काम को यज्ञ कहा गया है। आप रूचि से और जिसके लिए खाना बना रहे है उसके रूचि को ध्यान में रखकर जब खाना बनाते है तो वह एक यज्ञ के सामान है। रूचि होने से खाना बनाते समय आपको सामने वाले के रूचि का ध्यान आता है, और फिर आपको अपने लिए भी तो बनाना है और वही आपके शिशु के लिए भी है। आप खाना बनाते समय अपने शिशु से बात भी कर सकते है और उसे समझा भी सकते है कि आप उसी के लिए खाना बना रहे है।

यदि इसे कोई काम समझ कर आप खाना बना रहे है तो अच्छा कि आप खाना मत बनाइये।

7.घर में झाड़ू लगाना

बहन, आज से सिर्फ 25 वर्ष पहले 5% बच्चे का प्रसव ऑपरेशन के द्वारा होता था और 50 वर्ष पहले तो ऑपरेशन का कोई उपाय ही नहीं था और स्वस्थ बच्चे होते थे बिना तकलीफ के उसका कारण बस इतना ही था कि पहले कि महिलाएं सभी घरेलु कार्य किया करती थी। घरेलु कार्य करने से उनके बच्चेदानी एवं उनके आस पास की मांसपेशिया लचीली रहती थी और प्रसव सामान्य होता था। घर में झाड़ू लगाना या जांता पीसना ऐसा काम है जो आपके बच्चेदानी एवं उनके आस पास की मांसपेशिओं को ढीला करता है और आपके सामान्य प्रसव कि संभावना बढ़ जाती है। आप दोनों समय पुरे घर में झाड़ू अवश्य लगाएँ। आपको प्रसव के समय कठिनाइयाँ कम होगी।

दिनचर्या के इस प्रकरण को अगले भाग में जारी ररखेंगे।

थोड़ी सी अनियमितता के लिए क्षमा चाहता हूँ।

अगले शनिवार को फिर मिलेंगे रात को 9 बजे।

आभार

सोहन कुमार

मोगा, पंजाब 23.01.2021 (शनिवार)

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विनीत





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