20 फ़रवरी 2021

अपनेँ बच्चों की परिवरिश कैसे करें ? (भाग 10)

 4. गर्भ धारण से बच्चों के जन्म तक (गर्भ संस्कार) (भाग-6 और अंतिम )

तीसरी तिमाही

गर्भावस्था के सातवें माह से प्रसवकाल तक, अर्थात 29वें हफ्ते से 40 हफ्ते तक या प्रसव के समय तक की अवधि को तृतीय तिमाही कहते हैं।

तीसरी तिमाही में आपका अभिनन्दन है बहन !

पहली तिमाही के झंझट से निकल कर दूसरी तिमाही में थोड़ी चैन की साँस मिली.... अब परीक्षा के अंतिम सत्र में पहुँच गए…… अब तक आपमें भावनात्मक स्थिरता आ चुकी है…. अब आप उस नए शरीर को अपने शरीर के साथ एकात्मकता का अनुभव कर रहे है….. एकात्म का यह अनुभव माता कभी नहीं भूलती.. अक्सर बच्चे भूल जाते हैं।

अब आपके सामने एक चुनौती खड़ी है जिसे डर का रूप दे दिया गया है, वह चुनौती है "प्रसव क्रिया"।

"प्रसव क्रिया" को "प्रसव पीड़ा" का नाम दे दिया गया है।

यदि आपने इस धारावाहिक के पहले से नवें अध्याय तक ध्यान से पढ़ा है, और मैंने जितनी बात बताया है उसका यदि 20% भाग भी आपने अपनाया है तो आपको मुझपर थोड़ा यकीन हो गया गया होगा।

मैं इस बात को पुरे यकीन के साथ कह रहा हूँ कि "प्रसव पीड़ा" जैसा शब्द जान बुझ कर माताओं को डराने के लिए और बहुमंजिला अस्पताल को फायदा पहुंचने के लिए विश्व के डॉक्टर माफिया के द्वारा फैलाया गया नकली.... अपराधिक और शर्मनाक भ्रम है।

यह उसी प्रकार का भ्रम है जिस प्रकार का भ्रम रिफाइन तेल को पौष्टिक बताकर अरबों लोगों को दिल का मरीज बना दिया गया। प्रसव पीड़ा के भ्रम के कारण अधिकतर माता सामान्य प्रसव की योजना नहीं बनाते, वो बनाना भी चाहे तो डॉक्टर उनको नहीं बनाने देगा। बहन इन डॉक्टरों से सावधान रहना। और अपनी सूझबूझ और अपने माता, चाची आदि बुजुर्ग महिलाओं के अनुभवों का लाभ लेना।

"प्रसव क्रिया" उतना ही सामान्य है जितना मासिक धर्म का शुरू होना या शरीर कि अन्य क्रिया। इससे अधिक तकलीफ का ये विषय नहीं है। आपको इस बात पर यकीन नहीं आ रहा होगा और आप सोच सकते है कि मैं आपको सांत्वना देने का कोशिस कर रहा हूँ।

जड़ा सोचिये पुराने ज़माने में एक माता को 7-8 बच्चे होते थे। अगर ये इतना तकलीफदेह होता तो कोई माता दूसरी बार उस पीड़ा को स्वीकार करती ?

पीड़ा होती है, बहुत पीड़ा होती है लेकिन उतना नहीं होती जितना ये माफिया डॉक्टर ने डर फैला रखा है।

इस समय में आपके शरीर के अंदर बहुत सारे बदलाव आते है जो पेट में पल रहे बच्चा के सम्बर्धन के लिए आवश्यक होता है.... इतना ही नहीं बच्चे के जन्म लेने के बाद भी उसके आहार का इंतजाम आपके स्तन में कर दिया जाता है। उसी प्रकार बच्चे को गर्भ से बाहर निकलने के लिए जिन मांसपेशिओं को ढीला होने कि जरूरत है…… आपको ज्योंही दर्द शुरू होता है आपके शरीर की वो सभी मांसपेशिया, जो बच्चों को बाहर निकालने में सहायक है, अपने आप ढीली हो जाएगी, इसकी पूरी तैयारी आपके शरीर ने कर रखी है, आपको चिंता करने का जरूरत नहीं है।

प्रसव पीड़ा के विषय पर मैं ज्यादा ज्ञान दूँ तो वो माताएं नाराज हो जाएँगी जिन्होंने इस पीड़ा को झेला है। मैं आपको सलाह दूंगा कि इस पीड़ा के सम्बन्ध में आप उन दोनों प्रकार के माताओं से बात कीजिये 1. जिन्होंने अपने होशोहवास में बच्चे को जन्म दिया है, और 2. जिनका बच्चा उनके बेहोशी में प्रगट हो गया।

अपने बच्चे को होशोहवास में जन्म देने की जो पीड़ा है वह बेहोशी में उत्पन्न हुए आराम से अधिक सुखदायी है।

प्रसव पीड़ा के भय से मुक्त होकर तीसरी तिमाही का आनंद लीजिये। आप कुछ नहीं कर रहे है, सबकुछ अपने आप हो रहा है, जो हो रहा है उसे होने दीजिये। भगवान् पर भरोसा रखिये सब कुछ वही कर रहे है, आपको भी वही प्रगट किये है, आपके बच्चे को भी वही प्रगट करेंगे।

तृतीय तिमाही के लक्षण इस प्रकार है

गर्भाशय के आकार में वृद्धि के साथ पेट का बढ़ना:- गर्भावस्था में महिला का पेट बढ़ना 36 वें हफ्ते तक जारी रहता है

पेशाब बार-बार आना:- बढ़ते गर्भाशय द्वारा मूत्राशय पर दबाव डालने के कारण बार-बार पेशाब आने का लक्षण लक्षण पुनः दिखाई देने लगता है।

वजन तेजी से बढ़ना:- इस तिमाही में महिला का वजन बहुत तेजी से बढ़ता है और पूरी तिमाही में महिला का वजन लगभग 6KG में वृद्धि होती है।

पैरों में सूजन:- गर्भाशय के आकार में वृद्धि से रक्तवाहिनियो ऊपर दबाव पड़ता है जिससे पैरों में सूजन आ जाती है।

थकान व कमजोरी:- इस तिमाही में महिला पुनः अत्यधिक थकान व कमजोरी का अनुभव करती है। इसलिए इस दौरान शारीरिक सक्रियता थोड़ी कम कर देनी चाहिए और काम के बीच-बीच में आराम करते रहना चाहिए।

बैठने में मुश्किल होना:- पेट बढ़ने के साथ ही महिला को अधिक देर तक एक ही जगह बैठे रहने में मुश्किल होती है। इसलिए उठकर थोड़ा-थोड़ा टहलना और विश्राम जरूर करना चाहिए।

31वें हफ्तों में आपके शिशु की पाँचों इंद्रियाँ पूरी तरह से विकसित हो जाती हैं?

32वें हफ्ते के आसपास शिशु की हड्डियां पूरी तरह से बन चुकी होती हैं। अब बच्चा आंखें खोलने और बंद भी करने लग सकता है और उसे रोशनी महसूस होने लगती है।

37वें हफ्ते तक शिशु का संपूर्ण विकास हो चुका होता है और अब वो जन्मै लेने के लिए तैयार होता है।

ये समय विशेष ध्यान रखने वाला होता है और इस समय शारीरिक सक्रियता कुछ कम कर देनी चाहिए।

आप उस दिन के काफी करीब आ गई हैं, जब आप अपनी बाहों में अपने शिशु को उठाएंगी।

प्रसव पीड़ा की चिंता कभी मत करना बहन, जितनी चिंता करोगी उतनी पीड़ा होगी, जितनी कम चिंता करोगी उतनी कम पीड़ा होगी और यदि चिंता नहीं करोगी तो पीड़ा भी नहीं होगी। आप इस प्रयोग को आजमा कर देखो, इसके लिए कुछ नहीं करना है सिर्फ चिंता छोड़ देना है। भगवान पर भरोसा करो और मेरे बातों का भी।

भगवान पर भरोसा रखने वाले को कभी कोई पीड़ा नहीं होती।

बहन, गर्भ संस्कार का ये अंतिम अध्याय है। भाग 5 से भाग-10 तक गर्भ संस्कार के 6 अध्याय का प्रकरण चल रहा था। जो कोई भी इस लेख को पढ़ रहे है और कोई गर्भवती बहन उनके पहचान का हो, तो उन तक जरूर पहुँचाइये, यह अत्यंत लाभदायक और कारगर उपाय है जिसके सहारे आप एक संस्कारवान संतान को उत्पन्न कर सकते है।

अगले शनिवार आपके गोद में नन्हा सा बच्चा या बच्ची होगा और हम सीखेंगे कि उसका परिवरिश कैसे करे ?

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आभार

सोहन कुमार

मोगा पंजाब दिनांक- 20.02.2021





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