19 जून 2021

"फादर्स डे" भारत के लिए कितना प्रासंगिक ?

कल विदेशी "पिता दिवस" है।

मुझे लगता है कि स्त्री जब अपने सबसे सुन्दरतम और वात्सल्य रूप में होती है तो 'माँ' होती है, और पुरुष जब अपनी सम्पूर्ण गरिमा और सम्बल के साथ खड़ा होता है तो 'पिता' होता है।

लेकिन इस "फादर्स डे" के युग में आप अपने पिता होने के गरिमा और सम्बल को बच्चों के शादी होने के बाद नहीं बचा सकते।

आज इस विदेशी "पिता दिवस" के अवसर पर Zee Business के इस सर्वे पर थोड़ा विचार कीजिये

1. 35% माता-पिता को करीब- करीब रोजाना परिजनों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है।

2. 79% माता-पिता को लगातार अपमानित किया जाता है।

3. 76% को अक्सर गालियां और उलाहना सुनने को मिलती हैं।

4. 39% मामलों में बुजुर्गो ने बदहाली के लिए बहुओं को जिम्मेदार माना है।

5. 20% बेटियां भी अपने मां बाप पर जुल्म ढा रही हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक 21% माता-पिता को सुरक्षित बताया गया है लेकिन मेरा अनुमान ये है की इन 21% में 20 % ऐसे माता-पिता है जो किसी सर्वे रिपोर्टर को या यहाँ तक कि अपने परिचितों और मित्रों को भी अपने बच्चों द्वारा किये गए अपमान की बात को नहीं बताना चाहते है।

बच्चे को जब पिटाई लगती है तो उसका चिल्लाना पड़ोस तक सुनाई देता है परन्तु माँ-बाप की शिशकियाँ घर के अंदर भी सुनाई नहीं देता।

1% माँ-बाप ऐसे होंगे जो वात्सल्य और गरिमा के साथ अपनी जीवन जी रहे होंगे शायद ………

इस रिपोर्ट में एक बात और नजर आती है की अब लड़कियां भी किसी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं होना चाहती।

"फादर्स डे" / "मदर्स डे" हमारे देश की परम्परा नहीं है। पश्चिमी देशो में जहाँ अधिकतर बच्चे अबैध होते हैं और उन बच्चों का पालन पोषण चर्च करता है इसलिए वहाँ चर्च के पंडित को फादर बोला जाता है, वहाँ इस बात का ठीक से पता भी नहीं होता कि वास्तव में बच्चे का पिता है कौन ?

ये "फादर्स डे" शुरू करने वाली अमरीका की एक महिला सोनेरा डोड थी जिसके माँ का देहांत बचपन में ही हो गया और उसके पिता विलियम स्मार्ट ने सोनेरा को चर्च में पालने के लिए नहीं भेजा और सोनेरा के लिए सबसे बड़ी बात ये थी कि उसे ठीक से पता था कि विलियम स्मार्ट ही उसके वास्तविक पिता है जो वहाँ के अक्सर लोगों को पता नहीं होता।

सोनेरा डोड और अमरीका के लिए "फादर्स डे" मनाना बहुत प्रासंगिक भी है और उसके सम्बेदनशीलता को भी दर्शाता है ।

हम क्यों मना रहे है ????????

हमारा एक ही पिता होता है और एक परमपिता। हम तो पिता को परमपिता के भी ऊपर रखते हैं। हम तो माता पिता के मृत्यु के बाद भी देवताओं से पहले पितरों की पूजा करते है।

हमारी परम्परा तो ये है कि पिता के आशीर्वाद को परमपिता भी नहीं टाल सकते ऐसे उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा हुआ है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का बरदान उनके पिता ने दिया जो परमपिता भी नहीं दे सकते।

हम तो "अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्धर्मो यशो बलम्।।" वाले लोग हैं।


भीष्म पितामह और श्रवण कुमार के देश में हमें क्या सोनेरा डोड से पितृ भक्ति सीखने की जरुरत है ?

पश्चिमी संस्कृति ने हमारे देश के पारम्परिक पारिवारिक अनुशासन को जिस प्रकार से ध्वस्त किया और बूढ़े माता पिता के उपयोगिता को समाप्त करके उसे बृद्धाश्रम में छोड़ देने का हिम्मत करने लगा उसे अपमानित और यहाँ तक की पिटाई भी करने लगा, उस क्रूर कर्म को सभ्यता की पहचान देने के लिए हमने "फादर्स डे" और "मदर्स डे" मनाना शुरू कर दिया।

इस देश का अधिकांश पिता जिसके बच्चे स्वाबलंबी हैं और उनकी शादी हो गयी है वह 'पिता दिवस' को 'पराजित दिवस' की तरह महसूस करता है।

आज बच्चे अपने माता-पिता को एक बोझ की तरह देख रहे हैं। ऐसा बोझ जिसे वो ढोना नहीं चाहते। शायद इसी लिए श्रवण कुमार के इस भारत में मां-बाप की सेवा करने के लिए भी कानून बनाने की जरूरत पड़ गयी।

यदि आपके बच्चे छोटे है और आप पर आश्रित है तो यह आपके लिए एक उल्लास भरा दिन होगा। आपके दिए गए पॉकेट मनी से ही वो आपको उपहार देगा और आप आत्मबिभोर हो जायेंगे।

मुझे ऐसा लगता है कि जो चीज जीवन के साथ ही आया है वह मृत्यु के समय तक बना रहता है जैसे जीभ जीवन के साथ ही आया था और वह मृत्यु तक रहेगा लेकिन दाँत बाद में आता है और मृत्यु से पहले चला जाता है।

आप पुत्र /पुत्री जन्म के साथ ही होते है और मरने के समय तक बने रहते है लेकिन माता पिता बाद में बनते है और मरने से पहले नहीं रह जाते।

बच्चे का स्वाबलंबन और उनकी शादी तक ही आप पिता रहते है उसके बाद यदि आप चाहे तो 'पितृ दिवस' मना सकते है लेकिन आप पिता नहीं रहते। आप पिता रहने का भ्रम पाल सकते है। आपकी उपयोगिता जा चुकी होती है।

जिस दिन आप का बच्चा आपसे प्रश्न करे कि -

1. आपने मेरे लिए क्या किया? आप अपने माँ-बाप के लिए क्या किया ? और उनके साथ कैसा व्यव्हार किया

2. आपको जो मैंने पैसे कमा कर दिया उसका क्या किया? (यदि कभी कुछ दिया होगा तो)……..

3. मैं अपने बच्चों के साथ इस प्रकार का व्यव्हार नहीं करूँगा ……..

4. जब वह बात करने के साथ ही विवाद करना शुरू कर दे। और आपको उससे बात करने से पहले सोचने कि जरुरत पर जाये ……..

5. जब वह अपने ममतामयी पत्नी से आपको तमीज से बात करने का सलाह दे …..

6. जब उसे पत्नी के आने के बाद आपको बर्दास्त करने में कठिनाई हो रही हो …….

7. जब आप उसकी ओर देख कर मुस्कुरा नहीं सकते हैं …..

तो आपको समझ जाना चाहिए कि वह आपको पिता के गरिमा वाली कुर्सी से नीचे उतरने के लिए कह रहा है और यदि आपने इस संकेत को नहीं समझा तो बात ओर आगे बढ़ जायेगी ओर तब पिता के गरिमा को तो छोड़ दीजिये आप अपने मनुष्य होने कि गरिमा को भी नहीं बचा पाएँगे।

इस सदी में इस देश के माँ-बाप की जितनी दुर्दशा हुई हैं इससे पहले कभी नहीं हुई। इस देश में "फादर्स डे" / "मदर्स डे" माँ-बाप के साथ भद्दा मजाक है।

माँ-बाप के इस बदहाली में होने का कारण क्या है ?

1. लड़किओं का परिवरिश -

आज कल के अक्सर माँ-बाप अपने लड़किओं को घर बसाने की दिशा में प्रेरित नहीं करते बल्कि कई तो लड़किओं का घर बसने ही नहीं देते। परिवार के टूटने का सबसे बड़ा कारण लड़किओं के मइके का हस्तक्षेप होता है। लड़की भी चाहती है और उसके माँ-बाप भी चाहते है की लड़का लड़की अपने माँ-बाप से अलग स्वतंत्र हो। ऐसा वो अपने लड़की के सुख और आराम के लिए चाहते है लेकिन जब अपनी बहु की बरी आती है तव वो दूसरे ढंग से सोचते है।

यदि आप बहु को अपने घर की मानती है तो अपने बेटी को उसके घर की बहु बनने दीजिये।

2. सोशल मीडिया -

सोशल मीडिया के इस युग में लड़की को मार्ग दर्शन करने के लिए उनके माँ-बाप हमेशा उपलब्ध है उनको ससुराल पक्ष से मार्गदर्शन की जरुरत ही नहीं पड़ती। वह ना कभी ससुराल को समझ पाती है और ना ही सास ससुर को। करुणा अपने माँ-बाप के लिए है प्यार पति से चाहिए सास ससुर से बस उसका सम्पति ही काफी है। जिसे हासिल करने के लिए ना सेवा कि जरुरत है और ना सम्मान की। वह उसे क़ानूनी रूप से प्राप्त है।

3. मूर्खता -

माँ-बाप को तिरस्कार करने को मैं बच्चों की सबसे बड़ी मूर्खता मानता हूँ। और माँ-बाप की मूर्खता ये मानता हूँ कि माँ-बाप ये चाहते थे कि हमारे बच्चे अंग्रेजी पढ़ ले ताकि अधिक पैसा कमा सकेगा। संस्कृत पढ़ने से क्या होगा भूखों मरेगा। अंग्रेजी पढ़ने के बाद बच्चे अपने को मुर्ख मानने के लिए तैयार नहीं होगा उसे अपने विद्वता का घमंड होगा और आपको भी लगेगा कि मेरा बच्चा बहुत विद्वान है।

बच्चों को संस्कृत भाषा जरूर सिखाइये और अपने संस्कृति का ज्ञान दीजिये।

4. जेनरेशन गैप -

आधनिक बच्चों ने अपने क्रूरता को फूलों से सजाने के लिए एक बहुत ही सभ्य दिखने जैसा शब्द का अविष्कार किया वो है "जेनरेशन गैप"। दुनियाँ में इस शब्द से अधिक धूर्तता भरा शब्द दूसरा कोई नहीं है।

आप जब बच्चे थे "जेनरेशन गैप" उस समय भी था। आपको खाने नहीं आता था। आपको चलने नहीं आता था। आपको कपडे नहीं पहनने आता था। आप विस्तर पर पेशाब कर देते थे। आपके माँ-बाप ने इसे "जेनरेशन गैप" नहीं माना इसे आपकी विवशता माना और आपको संभाला। आज उस माँ-बाप की वही गती है, वह कमा कर खा नहीं सकता, वह चल नहीं सकता, वह कपडे नहीं पहन सकता। वह कभी कभी विस्तर पर पेशाब कर देता है। यह "जेनरेशन गैप" हो गया ?

"विवशता" जैसे शब्द के बदले जेनरेशन गैप" जैसे शब्द का प्रयोग करने से बड़ा क्रूरता और कुछ भी नहीं है।

और ये "जेनरेशन गैप" होने में कितना समय लगा ? आप 20-25 वर्षों तक माँ-बाप के साथ थे कोई "जेनरेशन गैप" नहीं था। आपकी शादी हुई और शायद अगले ही दिन ही "जेनरेशन गैप" हो गया।

"जेनरेशन गैप" जैसा कोई वास्तविक घटना नहीं है। आपके और आपके माँ-बाप के बीच आपकी प्यारी पत्नी आ गयी और माँ-बाप आपको दिखना बंद हो गया। पत्नी अकेली होती तो बगल से माँ-बाप दिख भी जाता लेकिन पत्नी के बगल में उनके माँ-बाप अर्थात आपके सास, ससुर, साला, साली,.... आदि खरी दिख रही है । माँ-बाप दिवार के उस और चले गए और आपको लगा कि "जेनरेशन गैप" हो गया।

जेनरेशन गैप" होने के समय को तो याद कीजिये?

बच्चों के इस आक्रमक रवैये से माँ-बाप को कैसे बचना चाहिए ? -

1. ममता छोर दीजिये -

आपको अपने बच्चों के प्रति जो ममता है वही आपके तिरस्कृत होने का सबसे बड़ा और एक मात्र कारण है। आप ममता को कोमलता या वात्सल्यता समझ रहे हैं। ममता एक प्रकार का मोह हैं इसके गहराई में लोभ भी हैं।

अपने शास्त्रों में भी ममता को सबसे बड़ा दुर्गुण बताया गया है, आप एक बार गीता पढ़ लीजिये। ममता करने चोरी करने से भी ज्यादा बुड़ा हैं। चोरी करना पड़ता है तो कर लोजिये ममता मत कीजिये।

आपके बच्चे आपके ममता को खिलौना बना कर उसी प्रकार खेलते है जिस प्रकार से वो उस खिलौने से खेलते थे जो आप बाजार से ला कर देते थे। वो उस समय भी नहीं समझते थे कि ये खिलौने जो किसी काम के नहीं है आपने अपने किसी निजी जरूरतों को कम करके सिर्फ उसके ख़ुशी के लिए ख़रीदे है। वह आज भी नहीं समझ रहा है कि आपकी निजी जरुरत क्या है ?

आपको उस समय उसे खिलौना देना भी आपका ममता था और इस समय उसका तिरस्कार सहना भी आपका ममता है।

2. उसके "फादर्स डे" कि जगह अपना "चिल्ड्रन डे" मनाइये-

वर्ष में एक दिन याद कीजिये। आशीर्वाद दीजिये। उसके प्यारी पत्नी और उसके बच्चे के बारे में जानकारी लीजिये। बाँकी दिन भूल जाइये। तिरस्कार को याद करके अपने को कमजोर मत कीजिये। मृत्यु आने से पहले रोज रोज मत मारिये। मोदी सरकार ने माता पिता के सुरक्षा का पूरा इंतजाम कर दिया है कानून तो पहले भी था लेकिन अब उस कानून में कोई पेचीदगी नहीं है। ममता मत कीजिये अपने सम्मान का रक्षा कीजिये।

3. दहेज़ मत लीजिये -

दहेज़ नहीं लेकर आप परिवार को संतुलित रखने का सपना मत देखिये क्योंकि कृतघ्नता का महिमा अनंत है। आपके बच्चे जिसके लिए आपने 20-25 वर्षों तक खून पसीना एक कर दिया था, वह मुँह मोड़ ले सकता है, तो थोड़े से दहेज़ नहीं लेकर किसी पराये के बेटी से आप कितना उम्मीद रखते है ?

आप जब दहेज़ लेते है तो उस समय तक आपको लगता है कि मेरा बेटा है, मेरी बहु होगी। बाद में आपको पता चलता है कि ना बेटा रहा ना बहु, और जो दहेज़ मिला था उसका तो उसी समय बहु के गहने और बेटे के गाड़ी में खर्च हो गया और जो बचा था उससे घर कि रंगाई पुताई करवा ली थी, नयी बहु के स्वागत में।

सास बहु के विवाद का अधिकांश मुद्दा दहेज़ से सम्बंधित होता है जो जीवन भर चलता रहता है।.

अब सोचिये कि नए कानून के तहत यदि आपने अपने बच्चों को अपने घर से और जायदाद से बेदखल करना पड़ा तो आपकी बहु नहीं खड़ी हो जाएगी की बाहर निकालने से पहले मेरे पिताजी ने जो पैसे दिए वो मुझे दे दो।

आप क्या उस समय उस पैसे का हिसाब देंगे ? या पैसे वापस करेंगे ? उस समय आपके पास उतने पैसे होंगे ?

दहेज़ मत लीजिये, उसके बाद बच्चे आपके जितने परवाह करते है आप भी उतना ही परवाह कीजिये। ममता मत कीजिये वह समझदार हो चूका है और धूर्तता भी समझदारी से कर रहा है। अब वो बचपना वाली बात भूल जाइये अब ना वह बच्चा रहा और ना आप जवान।

मेरे कुछ मित्रों को यह लेख पसंद नहीं भी आएगा लेकिन मैं इसके लिए क्षमा नहीं माँगूँगा बल्कि आपको इस विषय में विचार करते रहने का प्रार्थना करता रहुँगा।

आप हमारे लेख को बहुत ध्यान से पढ़ते है, आपका अभिनन्दन है।

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आभार

सोहन कुमार

खेडाप्पा जोधपुर राजस्थान, दिनांक – 19.06.2021 (शनिबार)) (जयेष्ठ शुक्ल - नवमी)




 

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