मित्रों
यह लेख आज के सन्दर्भ में थोड़ा अनुचित हो सकता है क्योंकि
इन लगभग दो वर्षों से हम महान आपातकाल की परिस्थितिओं से गुजर रहें है, लेकिन एक सामान्य जीवन में इसे पढ़ने के बाद आप
बेरोजगार नहीं रह पाएँगे।
बेरोजगारी एक राजनितिक मुद्दा हैं... यह कोई सामाजिक या आर्थिक समस्या नहीं हैं बल्कि समस्या ये हैं कि हमारे देश में काम करने वाले लोगों का… जिम्मेवार लोगों का… मेहनती.. ईमानदार और कर्मठ लोगों का अत्यंत अभाव हैं।
इस देश की सभी कम्पनिओं में इस तरह के लोगों के लिए हमेशा जगह खाली है।
लेकिन हमें सरकारी नौकरी चाहिए। काम कम चाहिए.. सुबिधा अधिक चाहिए.. जिम्मेवारी नहीं चाहिए… ऊपर की आमदनी भी चाहिए।
कौन लोग हैं जो बेरोजगार होते हैं ?
1. जो पढ़ाई के समय जागरूक नहीं थे। डिग्रीयाँ ले ली, लेकिन ज्ञान नहीं हासिल कर पाए।
2. जो अपने नकली डिग्रीयाँ से निचे के स्तर में काम करने को राजी नहीं हैं और किसी ऊँचे स्तर पर काम करने के योग्य नहीं है।
3. जो निठल्ला, कामचोर और आलसी प्रवृति के होते हैं।
4. जिनके लिए माता-पिता का धर्मशाला अभी भी खुला हुआ हैं, खाने, रहने और दोस्तों के साथ मौज मस्ती के लिए थोड़े से जेब खर्च का इंतजाम बरकरार हैं।
5. जिनके माता-पिता को सरकारी नौकरी थी और अब
पेंशन मिल रहा हैं। ध्यान दीजिये ऐसे लोग जीवन भर बेरोजगार रह सकते हैं क्योंकि
पेंशन वाले माता पिता का सेवा भाव आपके सम्मान को भी कम नहीं होने देगा और आप
बेरोजगारी का सुखद आनंद उठाते रहेंगे।
आप बेरोजगार इसलिए हैं क्योंकि आप बेरोजगारी का आनंद ले रहे हैं। आपको माता पिता और बुजुर्गों की सहानुभूति प्राप्त हैं…. आपको अपने धैर्यवान होने का दम्भ है… बेरोजगारी की समस्या पर चर्चा करने का अवसर है.. सरकार की नीतियों को दोषपूर्ण बताने का ज्ञान है.. उनके वादे पुरे नहीं करने का रोष है… और उसे गाली देने का पूरा अधिकार… स्मार्ट फ़ोन तो आपके हाथ में है ही। इतनी गरिमा और महिमा के बाद भला कौन नौकरी करना चाहेगा ?
इस लेख को पूरा करने के लिए मैं अपने जीवन के कुछ निजी अनुभव आपको बताता हूँ जिसे मैंने अपने बेरोजगारी के दरम्यान अनुभव किया।
पढ़ाई समाप्त होने के बाद जब मैं बेरोजगार हुआ उस समय पिताजी का धर्मशाला खुला था और मैं बेरोजगारी के समस्या पर लम्बी बहस कर सकता था।
सौभाग्य से मुझे नौकरी मिल गया और जीवन आगे बढ़ गया….
लेकिन जीवन
का कुछ निर्णय मुझे फिर से बेरोजगार कर दिया और इस बार पिताजी का धर्मशाला बंद हो
चूका था.. बल्कि मैं खुद पिता बन चूका था और अपने बच्चों का धर्मशाला चला रहा था।
अब मेरे मन में बेरोजगारी के समस्या पर बहस करने के बजाय इसे हल करने का विचार आ रहा था।
3 सितम्बर 2002 का वह दिन था जब मैं रोजगार की तलाश में निकला और अपने एक मित्र (समरेंद्र नाथ श्रीवास्तव) के पास गया, वह इंजिनियर हैं.. मैं भी इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रखा हूँ… इसलिए ऐसा नौकरी ढूंढ़ रहा था जिसके पद में कम से कम इंजिनियर लगा हो… मैनेजर लग जाता तो और भी अच्छा था।
मुझे पैसे से अधिक जरुरी अपने पद और अपनी झूठी गरिमा को संभालना था।
मुझे पैसे की उतनी ही जरुरत थी जितनी मजदूरी करके भी कमाया जा सकता था।
दो महीने से अधिक का समय हो गया मुझे कोई नौकरी नहीं मिली। यहाँ मेरे पिताजी का धर्मशाला नहीं था और मैं जो धर्मशाला चला रहा था उसका हाल भी बेहाल होना स्वभाविक था।
मुझे सोचने की दिशा में परिवर्तन करने का अब समय आ गया था । मेरे एक मित्र हैं (अरुण मिश्रा) ये सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी देने का काम करतें हैं। मैंने उनसे फोन पर बात किया… उन्होंने मुझे बताया की ये काम तो आपके लायक नहीं हैं लेकिन यदि आपको जरुरत पर ही जाय.. तो आप जिस दिन आएंगे आपको उसी दिन नौकरी लग जायेगी।
मैंने यह बात अपने मित्र (समरेंद्र नाथ श्रीवास्तव) को बताया.... वह समय मुझे आज भी याद है... हमलोग उस मकान के छत पर बात कर रहे थे और जब मैं यह बात उसे बताया तो वह रोने लगा….मुझे भी रोना आ गया था।
उस रात मैं चौकीदारी के नौकरी के सम्बन्ध में कुछ योजना बनाया जिसमे जितना मुझे याद है उसे बताता हूँ –
1. मैं अपने ड्यूटी के दरम्यान पुरे आठ घंटा (लंच समय छोड़कर) खड़े होकर ड्यूटी करूँगा भले ही वहाँ बैठने के लिए स्टूल की सुबिधा क्यों ना हो।
2. शुरू में खड़े रहने में तकलीफ हो सकती है लेकिन एक महीने में मैं लगातार 4 घंटे खड़े रहने का आदत विकसित कर लूंगा।
3. हरेक आने जाने वाले लोगों को उचित सम्मान दूंगा और ड्यूटी के दरम्यान हमेशा चौकस रहूँगा।
4. एक वर्ष में मैं उस कंपनी के सभी चैकीदारों के प्रशिक्षक के पद पर रहूँगा और ये सिखाऊंगा की चौकीदारी कैसे करना चाहिए।
5. 10 वर्ष में मैं उस कंपनी के मालिक के नीचे सर्वोच्च पद पर रहूँगा।
मेरी यह योजना मेरे अहंकार को संतुष्ट कर रहा था और वर्तमान परिस्थितिओं से संघर्ष करने का साहस भी दे रहा था।
अब मेरा अहंकार जा चूका था और मुझे बिलकुल पास में ही एक कंपनी मिल गयी जो मेरे मित्र के अंदर ही काम कर रही थी। छोटी कंपनी थी (राज अर्थमूवर्स), और हमारे सेठ थे श्री जीतेन्द्र सुराणा।
आप रोजगार वहीँ से शुरू कर सकते हैं.. जहाँ आप खड़े हैं और यह आसान भी है.. और आप वहाँ तक अवश्य पहुँच जायेंगे.. जितनी आपमें क्षमता और योग्यता है। हम शुरू ही नहीं करतें है और बेरोजगारी का रोना रोते हैं।
हमारे देश में काम करने वाले जिम्मेदार, उत्साही, कर्मठ, ईमानदार और लगनशील लोगों का बहुत बड़ा अकाल है।
आप जहाँ है और जो काम मिल रहा है वहीँ से शुरू कर दीजिये। कुछ नहीं मिल रहा है मजदूरी शुरू कर दीजिये। आप अपने शारीरिक और मानसिक कुशलता को बढ़ाइए और अपनी मंजिल पर निगाह रखिये।
सब कुछ आज ही मिल जाएगा इसकी उम्मीद मत रखिये। आज जो मिल रहा है उसका उपयोग कीजिये।
मैं सभी माता-पिता से निवेदन करता हूँ कि यदि वे अपने बच्चे को बेरोजगार नहीं देखना चाहते है तो पढ़ाई ख़त्म होने के बाद तुरंत अपने धर्मशाला को बंद कर दीजिये। मैं तो गर्मी आदि के लम्बी छुट्टी में भी अपने धर्मशाला को बंद कर देता था।
जिसे काम करके खाने में शर्म आता है मैं उससे अधिक बेशर्म और किसी को नहीं समझता हूँ।
मैं उन सभी सैकड़ों मित्रों से निवेदन करता हूँ जो मुझे नौकरी के लिए मैसेज करतें है कृपया ना करें।
आप हमारे लेख को बहुत ध्यान से पढ़ते है, आपका अभिनन्दन है।
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आभार
सोहन कुमार
मोगा पंजाब, दिनांक – 10.07.2021 (शनिबार)) (आषाढ़ कृष्ण - अमावस्या)

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