मित्रों,
मैं 22.07.2021 से
31.07.2021
तक
विपश्यना शिविर, होशियारपुर, पंजाब में
भाग लिया। और मैं इसे अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि मानता हूँ… जो मेरे
जीवन को एक आध्यात्मिक दिशा दे गया।
यह लेख इस ब्लॉग का पहला आध्यात्मिक लेख है। इससे पहले शीर्षक भले ही "मेरे राम" या "मेरे कृष्ण"… होता होगा, परन्तु मुद्दा राजनितिक ही हुआ करता था।
इसे अंत तक जरूर पढ़ें और मैं चाहता हूँ कि इसे आप दो बार पढ़े ।
मैं इस लेख को अपने 58 वे जन्म दिन पर आपको समर्पित करता हूँ।
विपश्यना साधना है क्या ?
विपश्यना का अर्थ है - विशेष प्रकार से देखना
(वि + पश्य + ना)। बुद्ध कहते थे : आओ और देखो।
विपश्यना साधना हमारे देश का और हमारे सनातन धर्म का प्राचीनतम साधना है। हमारा प्राचीनतम ग्रन्थ वेद है और वेद में प्राचीनतम वेद ऋग्वेद है।ऋग्वेद में भी विपश्यना का उल्लेख है।
ऋग्वेद 3/62/9 मन्त्र –
यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति |
स नः पूषाविता भुवत् ||
अर्थात जो समस्त लोकों को सब ओर से देखता है और सम्यक् प्रकार से देखता है वह पूषा-पुष्टिकर्त्ता परमेश्वर हमारा रक्षक होवे|
आज से लगभग 5000 वर्ष पहले भगवान कृष्ण ने भी गीता के उपदेश में कहा है-
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।15.10।।
अर्थात शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयों को भोगते हुए भी गुणों से युक्त जीवात्मा के स्वरूप को मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं।
इस ज्ञानरूपी नेत्र को अपनी चेतना में कैसे जागृत करें ? कैसे इस दिव्य चक्षु को प्राप्त करें - जो जीवन के सर्वांग रूप का दर्शन दे ? ऐसा सिर्फ श्लोक पढ़ कर नहीं प्राप्त किया जा सकता... कुछ प्रयोग करने होंगे। श्लोक पढ़ना बहुत अच्छा है.... श्लोक पढ़ कर आप बुद्धि के स्तर पर तथ्य को समझ भी लेंगे.... लेकिन चेतना के स्तर पर बिना प्रयोग किये हुए नहीं समझा जा सकता।
यह जीवन नश्वर है, एक दिन हमें मर जाना है, काम-क्रोध-लोभ सभी पापों का कारण है.... किसे नहीं पता ?
बुद्धि के स्तर पर ये बातें सब को पता है.. लेकिन बुद्धि को ये पता होना बहुत महत्व नहीं रखता या कोई महत्व नहीं रखता।
इन तथ्यों का महत्व तब है जब यह मेरे चेतना में आ जाये जिसे आधुनिक भाषा में subconscious mind कहते हैं।
ज्ञानरूपी नेत्र को विकसित करने की कला को हमारे धर्म का कर्म कांड ने विलुप्त कर दिया। अब आपके लिए पंडित जी मंत्र पढ़ देंगे और आपका स्थान स्वर्ग में सुरक्षित कर देंगे।
धर्म…. जो चेतना की सर्वोच्च अवस्था है..... मूर्खता और मूढ़ता की सीमा तक पहुँच गया।
भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं -
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
अर्थात- “जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब-तब मैं इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ।
भगवान बुद्ध का अवतार
(विपश्यना साधना का पुनर्जन्म।)
आज से 2584 वर्ष पूर्व जब धर्म एक कर्मकांड का पर्याय बन चूका था। भगवान बुद्ध का उदय हुआ। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म एक राजपरिवार ( कपिलवस्तु ) में हुआ उनके पिता शुद्धोदन एवं माता महामाया धर्मपरायण दंपत्ति थे।
इस राजकुमार का जन्म भी जंगल में हुआ। इनके जन्म के समय इनकी माता महामाया देवी अपने नैहर देवदह जा रही थीं, कपिलवस्तु और देवदह के बीच लुम्बिनी वन आता हैं, जहाँ इनका जन्म हुआ।
जन्म के सात दिन बाद ही माँ का देहांत हो गया। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया।
राजकुमार सिद्धार्थ बचपन से ही गंभीर स्वभाव के व्यक्ति थे और अक्सर एकांत में चिंतन किया करते थे। उन्होंने पुराणों और वेदों का गहन अध्ययन किया।
16 वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का विवाह राजकुमारी यशोधरा के साथ हुआ। यशोधरा और गौतम सिद्धार्थ एक ही उम्र के थे। उन्हें एक पुत्र भी प्राप्त हुआ जिसका नाम राहुल था।
19 वर्ष कि किशोराअवस्था में वन में जन्म लिए राजकुमार सिद्धार्थ गौतम… भगवान बुद्ध बनने के लिए सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर फिर से वन में चले गए।
राजकुमार सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध की यात्रा 16 वर्षों की थी।
35 वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन बोधगया में निरंजना नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध का अवतार हुआ।
भगवान बुद्ध के जीवन की यह अनहोनी घटना हैं कि उनका जन्म, उनकी ज्ञान प्राप्ति (बुद्धत्व या संबोधि) और उनका निर्वाण ये तीनों वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे।
वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहते हैं।बौद्ध धर्म में आस्था रखने वालों का यह सबसे बड़ा त्योहार है।
80 वर्ष कि अवस्था तक वे अपने ज्ञान को बाँटते रहे और अपने जीवन काल में ही लाखों लोगों को बुद्ध बना दिए। अंगुलिमाल जैसे खतरनाक डाकू को भी बुद्ध बना दिए।
दुनिया के 200 से अधिक देशों में बौद्ध अनुयायी हैं। किन्तु चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, लाओस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया एवं उत्तर कोरिया समेत कुल 13 देशों में बौद्ध धर्म 'प्रमुख धर्म' है।
आज दुनियाँ के 720 करोड़ लोगों में लगभग 50 करोड़ लोग बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं।
लेकिन ऐसा नहीं है की ये 50 करोड़ लोग बुद्धत्व को उपलब्ध हो गए है। आप सिर्फ बौद्ध धर्म को मानकर बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं हो सकते हैं। आप बौद्ध धर्म को नहीं मानकर भी सिर्फ भगवान बुद्ध के द्वारा किये गए प्रयोगों (विपश्यना साधना) को अपनाकर बुद्धत्व को प्राप्त कर सकते हैं।
आपने एक वाक्य सुना होगा "बुद्धं शरणं गच्छामि" मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ। आज से पहले मैं ये समझता था कि इसका अर्थ है… मैं गौतम बुद्ध का शरण लेता हूँ… लेकिन बात ये नहीं है।
लगभग 100 एकर में फैले उस साधना केंद्र पर कहीं कोई गौतम बुद्ध कि मूर्ति नहीं.. कही कोई फोटो नहीं.. कोई पूजा नहीं… कोई आरती नहीं.. कोई मंत्र नहीं।
"बुद्धं शरणं गच्छामि" का अर्थ है "सोहन बुद्धं शरणं गच्छामि" यदि आपका नाम अली है तो "अली बुद्धं शरणं गच्छामि"। आप ही बुद्ध हो, अपने बुद्धत्व का शरण लीजिये, बस अपने आप को देखिये।
भगवान बुद्ध के मुख्य 4 उपदेश हैं -
1. जीवन में दुःख है -
यह तो सबके अनुभव में है। जन्म भी दुःख है, मृत्यु
भी दुःख है और इस जन्म और मृत्यु के बीच में भी दुःख ही अधिक है, सुख
के क्षण तो पारिजात के फूल की तरह है जो सुबह हो भी नहीं पाता और
मुरझा जाता है।
2. दुःख का कारण है -
दुःख है तो अवश्य ही दुःख का कारण होगा और
भगवान ने कहा कि हमारे दुःख का कारण हमारे मन का विकार है।
3. दुःख का निदान है -
भगवान यह भरोसा दे रहे हैं कि दुःख का निदान
है।
4. दुःख निदान का मार्ग है -
यह मार्ग विपश्यना साधना है।
बौद्ध धर्म संसार का सर्वाधिक वैज्ञानिक धर्म
है जो ना आत्मा को मानती है और ना परमात्मा को। बस आप ही
हैं जो अपने दुःख का निर्माण कर रहे हैं, अपने सुख का निर्माण कर रहें हैं, राग
कर रहें हैं, द्वेष कर रहें हैं, जन्म ले
रहे हैं, मर रहे हैं, अपने आप को
देखिये, अपने आप ही समझ में आ जाएगा। अपने आप को
देखना ही विपश्यना है।
धर्म कि इस वैज्ञानिकता को देखकर आप अचंभित रह जाएंगे।
समय का चक्र घुमा… और एक बार फिर भारत में उत्पन्न यह धर्म अन्य देशों में तो फलता फूलता रहा लेकिन भारत से बिलुप्त हो गया।
वर्तमान भारत में विपश्यना को तीसरी बार किसने वापस लाया ?
श्री
सत्य नारायण गोयनका –
मैं इनको आधुनिक भारत का बुद्ध मानता हूँ।
इनका नाम बहुत लोगों ने नहीं सुना होगा। इन्हें 2012 में (निधन से 1 वर्ष पहले) 63 वें गणतन्त्र दिवस पर भारत के तृतीय सर्वोच्च्य नागरीक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
हमारे देश में नागरीक सम्मान का परंपरा थोड़ा अलग है। हम कोका कोला जैसे जहर बेचने वाले को भी भारत रत्न बना देतें है और अधिकतर तो जिनके सहमति से भारत रत्न दिया जाता है वह खुद ही भारत रत्न ले लेते हैं।
इनके पुरस्कार के स्तर से इनके व्यक्तित्व का आकलन मत कीजिये, आप एक बार विपश्यना शिविर में जाइये और इनके व्यक्तित्व का आकलन कीजिये। ये विश्व मानव रत्न थे। अब तो सिर्फ उनके वीडियो और ऑडियो विश्व के 219 और भारत के 113 विपश्यना केंद्रों में गूंज रही है।
सत्यनारायण गोयनका (जनवरी 30, 1924 – सितम्बर 29, 2013) जीवन परिचय-
श्री गोयनका जी का जन्म बर्मा (वर्तमान म्याम्यार) में हुआ।
उनके माता-पिता मारवाड़ी जाती के भारतीय लोग थे, जो तीन पीढ़ी पहले व्यापार
करने के लिए बर्मा चले गए थे। श्री गोयनका जी 1955 तक एक सफल व्यवसायी थे।
31 वर्ष कि अपनी युवावस्था के दिनों में गोयनका जी एक विशेष प्रकार के माइग्रेन से पीडित हो गये, जिसमे हर 15 दिन मे सिर में दर्द होता था। इसका कोई इलाज नहीं था। इसलिए उन्हें म़ॉरफीन के इनजेक्सन दिए जाने लगे। पर इन इनजेक्सनो के वे Addict हुए जा रहे थे। इसलिए उन्होने अपना इलाज स्विटजरलैंड, अमेरिका, जापान, U.K. जैसे कई विकसित देशों में कराया, परन्तु कोई लाभ नही हुआ।
उचित राहत पाने में असमर्थ होने के बाद उनका एक मित्र ने उन्हें विपासना गुरु सायज्ञी यू बा खिन से मिलने का सलाह दिए, उस समय तक म्याम्यार में विपासना.... अपने गुरु परंपरा के अनुरूप... शुद्ध रूप में विद्यमान थी। विपासना करने से ना केवल उनका रोग ही ठीक नही हुआ, उन्हे एक नया जीवन मिला।
उन्होंने सायागयी उ बा खिन का अनुसरण करते हुए 14 वर्षों तक इस विद्या को अच्छी तरह सीखा। इनके गुरु सायागयी उ बा खिन की इच्छा थी कि भारत का यह ज्ञान भारत को वापस मिलना चाहिए। वे इस ज्ञान को भारत का कर्ज मानते थे।
पहले तो अपने माता पिता के बीमारी के कारण गोयनका जी भारत आये बाद में अपने गुरु के कर्ज उतरने के लिए गुरुदक्षिणा स्वरुप भारत में पहली बार मात्र 10 लोगो को अपना पहला शिविर लगा कर विपश्यना सीखना शुरू किये। और फिर शिविर पर शिविर लगते चले गये और धीरे-धीरे विपश्यना मेडीटेसन सेन्टर्स की स्थापना होती चली गई।
आज सम्पूर्ण विश्व में श्री सत्यनारायण गोयनका जी के द्वारा (वीडियो के द्वारा) इस शिक्षा का अभ्यास कराया जाता है और इसके बहुत ही लाभदायक परिणाम सारी दुनियाँ के लोग प्राप्त कर रहें हैं।
भारत की तिहाड जेल, बडौदा जेल अन्य कई जेलो में कैदियो को सद्मार्ग पर लाने के लिए विपश्यना शिविर लगाये गये और सकारात्मक परिणाम सामने आये। कैदियो को अपनी गलतियो का एहसास हुआ और उन्होने फिर कभी उसे न करने का प्रण किया।
विपश्यना मेडीटेसन सेन्टर में दैनिक दिनचर्या-
विपश्यना के हर मेडीटेसन सेन्टर्स में निम्न लिखित दिनचर्या का पालन होता है–
4.00
AM – सुबह सो कर जागना
4.30
AM TO 6.30 AM – धम्मा हॉल में मेडीटेसन
6.30
AM TO 7.15 AM – नास्ता
7.15
AM TO 8.00 AM – विश्राम
8.00
AM TO 9.00 AM – धम्मा हॉल में मेडीटेसन
9.00
AM TO 11.00 AM – धम्मा हॉल में मेडीटेसन
11.00
AM TO 11.45 AM – भोजन
11.45
AM TO 1.00 PM – विश्राम
1.00
PM TO 2.10 PM- धम्मा हॉल में मेडीटेसन
2.10
PM TO 2.30 PM – विश्राम
2.30
PM TO 3.30 PM – धम्मा हॉल में मेडीटेसन
3.30
PM TO 5.00 PM – धम्मा हॉल में मेडीटेसन
5.00
PM TO 5.30 PM – चाय नाश्ता/जलपान
5.30
PM TO 6.00 PM – टहलना/ विश्राम
6.00
PM TO 7.00 PM – धम्मा हॉल में मेडीटेसन
7.00
PM TO 8.30 PM – Video Lecture By Shri S. N. Goyenka
8.30
PM TO 9.00 PM – धम्मा हॉल में मेडीटेसन
9.00
PM TO 9.30 PM – प्रश्नोत्तर
9.30
PM – सो जाना
विपश्यना मेडीटेसन सेन्टर के नियम व शर्ते -
अगर आप विपश्यना मेडीटेसन सेन्टर पर मेडीटेसन के लिए जाते है ,तो आपको कुछ नियमो का पालन करना होगा जो इस प्रकार हैं–
1. आर्य मौन – आपको 10 दिन तक किसी से भी बात नही करनी है। (न मुँह से ,न इशारों से, और न ही लिखकर) अपने गुरु से संक्षेप में कोई प्रश्न पूछ सकते हैं।
2. रात्रि भोजन नही- यहाँ आपको 2 बार नाश्ता और 1 बार खाना मिलेगा पर रात्रि में भोजन नही मिलेगा।
3. आप अपने साथ मोबाईल, कोई electronic item, कोई किताब, पैन, कागज आदि नही रख सकते।
शील पालन-
यहाँ 10 दिन तक आपको पंचशील का पालन करना पडेगा, जो इस प्रकार हैं—
1. सत्य- आपको 10 दिन तक झूठ नही बोलना है। इसलिए मौन का पालन कराया जाता है।
2. अहिंसा- आप 10 दिन तक किसी भी जीव जन्तु को मारेंगे और परेशान नही करेंगे। यहाँ तक की आप मच्छर भी नही मार सकते।
3. अस्तेय- 10 दिन तक आप किसी प्रकार की कोई चोरी नही करेंगे। यहाँ तक की सेन्टर की फूल पत्ती भी नही तोड सकते।
4. ब्रम्हचर्य- 10 दिन आप opposite sex से दूरी बनाकर रखेंगे। यहाँ स्त्री और पुरुष के लिए सब कुछ अलग अलग व्यवस्था है। वे सिर्फ ध्यान कक्ष में ही साथ दिखेंगे अन्य समय वे आपको नहीं दिखेंगे।
5. नशा न करना- 10 दिन आप किसी भी प्रकार का कोई नशा नही करेंगे।
10 दिन में आप क्या-क्या सीखेंगे ?
DAY-1 = अपनी आती जाती स्वाभाविक साँस पर ध्यान देना। (आनापाना
साधना)
DAY-2 = अपनी आती जाती स्वाभाविक साँस पर ध्यान देना। नाक के किस
सुर से साँस अन्दर आ रही दाँये से बाँये से या फिर दोनो से। इस पर ध्यान देंगे।
(आनापाना साधना)
DAY-3 = अपनी आती जाती स्वाभाविक साँस पर ध्यान देना। नाक के किस
सुर से साँस अन्दर आ रही दाँये से बाँये से या फिर दोनो से। इस पर ध्यान देंगे।
नाक के अन्दर साँस कहाँ-कहाँ टकरा रही है, इस पर ध्यान देंगे।
सम्पुर्ण नाक मे होने संवेदनाओ पर ध्यान देंगे। (आनापाना साधना)
DAY-4 = अपनी मूछ वाली जगह पर होने वाली संवेदनाओ पर सारा ध्यान देना।
(आनापाना साधना)
DAY-5 = विपश्यना की दीक्षा। अपने सिर से लेकर पैर तक शरीर के
प्रत्येक अंग मे से अपना मन गुजारना और उसमें होने वाली संवेदनओ पर ध्यान देना।
(विपश्यना साधना)
DAY-6 = अपने सिर से लेकर पैर तक शरीर के प्रत्येक अंग मे से एक-एक
करके अपना मन गुजारना और उसमें होने वाली संवेदनओ पर ध्यान देना। (विपश्यना साधना)
DAY-7 = अपने सिर से लेकर पैर तक और अपने पैर से लेकर सिर तक शरीर
के प्रत्येक अंग मे से अपना मन गुजारना और उसमें होने वाली संवेदनओ पर ध्यान देना।
(विपश्यना साधना)
DAY-8 = अपने शरीर के कई अंगो में से एक साथ अपने मन को गुजारना और
उसमें होने वाली संवेदनओ पर ध्यान देना। (विपश्यना साधना)
DAY-9 = अपने सारे शरीर में एक साथ एक जैसी संवेदनाओ की धारा प्रवाह
का अनुभव करना।
DAY-10 = अपने शरीर के भीतरी अंगो में से भी अपने मन को गुजारते हुए
होने वाली संवेदनाओ पर ध्यान देना। अपनी रीढ की हड्डी में से अपना मन नीचे से ऊपर
गुजारते हुए होने वाली संवेदनाओ पर ध्यान देना। (विपश्यना साधना)
साधना के समय 3 बातों का
ध्यान रहना आवश्यक है
1.
आपका मन शांत है।
2.
आप पूरी तरह सगज
हैं। और
3.
आप साक्षी भाव से
बिलकुल तटस्थ होकर अपनी सांसों और अपनी सम्बेदनाओं को समता से देख रहें है। अच्छी
सम्बेदनाओं से राग नहीं है और बुरी सम्बेदनाओं से द्वेष नहीं है। ये सारी
संवेदनायें अनित्य (Impermanent) है। जो आती है और देखते देखते चली जाती है।
यहाँ मुझे क्या क्या परेशानियाँ आयीं -
1.
मुझे जो-जो सामान
यहाँ लाने का निर्देश दिया गया था उसमे पानी का बोतल नहीं था। इसलिए मैं पानी का
बोतल नहीं ले गया और दो दिनों तक.. जब भी मुझे पानी पीना होता था.. मुझे मेस में..
जो मेरे रूम से लगभग 200 मीटर की दुरी पर था... जहाँ वाटर कूलर लगा था, पानी पिने के लिए जाना
पड़ता था।
यहाँ यदि आपको किसी वास्तु की आवश्यकता हो जाये तो मेस में ही, एक टेबल पर requisition slip रखा होता था.. जिसमे जो वास्तु आप लिख देंगे वह एक दो दिन में मिल जायेगा। मुझे पानी का बोतल मिलने में दो दिन लगा।
2. सामानों की सूचि में एक अलार्म घड़ी लाना था, मैं लाया भी था, लेकिन उसका बैटरी भूल गया, ये बात मुझे जाते ही पता लग गया, मोबाइल जमा कर दिया था और मेरे पास समय देखने का कोई साधन बचा नहीं.. हाथ में घड़ी था नहीं। तब तक मौन का प्रक्रिया शुरू हुआ नहीं था मैंने वहाँ के प्रबंधक को अपनी समस्या बताया और उनसे आग्रह किया कि मुझे मोबाइल दे दिया जाय... मैं उसे 10 दिनों तक फ्लाइट मोड में रखूँगा क्योंकि मुझे समय देखने की और समय पर उठने की समस्या होगी।
मुझे बताया गया की आप उठने की चिंता ना करें आपको समय पर उठा दिया जायेगा और समय देखने के लिए कई जगह बाहर की दीवारों पर घड़ी लगी हुई है। requisition देने के 3 दिन बाद मुझे घड़ी का बैटरी मिला तब तक रात को एक दो बार नींद खुलता था तो समय देखने के लिए मुझे घर के बाहर निकलना पड़ता था तो........... अलार्म घड़ी का बैटरी ले जाना मत भूलियेगा।
3.
बारिश में एक
छाता या रेन कोट लाने का निर्देश था... मैं रेन कोट ले गया था अब समस्या वहाँ ये
थी कि मेडिटेशन हॉल से 100 मीटर पर मेरा रूम था और हर घंटे 5 मिनट का ब्रेक होता था..
जिसमे घर में जाकर आप पानी पी सकते हैं या बाथरूम जा सकते हैं ...मुझे 2-3 मिनट तो रेन कोट पहनने और
खोलने में ही लग जाता था तो ..............आप जब भी जाइये (बारिश में) छाता लेकर
जाइये रेन कोट मत ले जाइये।
इस रेन कोट की एक और छोटी कहानी है - वहाँ एक सेवादार थे श्री हिमांशु उनका नाम मैंने 10 वे दिन मौन टूटने के बाद पूछा था... वो मेरी समस्याओं को देख रहे थे और 3 दिन बाद उन्होंने मुझे एक छाता दिया... मुझे बहुत आनंद आया... मैं रेन कोट के पहनने खोलने के संकट से बाहर आया... मैं उनको धन्यबाद देना चाहता था लेकिन मौन ऐसा था की धन्यवाद कहना तो दुर की बात है... आप उनकी तरफ देखकर मुस्कुरा भी नहीं सकते। 10 वे दिन मैंने उनको धन्यवाद दिया।
4.
लगातार 1 घंटे और दिन में 10-11 घंटे पैर मोड़कर
और रीढ की हड्डी सीधी करके बैठने में परेशानी होती थी, लेकिन इसके उलंघन का कोई
सजा नहीं था।
इस एक आसान पर बैठने की भी एक छोटी कहानी है - हमारे ग्रुप में एक लड़की थी वह जो बैठती थी तो बिकुल भगवान बुद्ध की तरह बैठती थी और जड़ा भी नहीं हिलती थी... जिस समय में रीढ की हड्डी सीधी करके बैठने का निर्देश नहीं होता था... जैसे प्रवचन सुनने के समय में 7 से 8.30 आप आराम से बैठ कर सुन सकते हैं... उस समय भी वह रीढ की हड्डी सीधी करके बैठी रहती थी। 10 वे दिन जब हमें बात करने की छूट मिली तो मैंने उसका नाम पूछा जो अभी याद नहीं है.. और उसे बताया कि तुम बहुत छोटी हो वरना मुझे तुम्हारे चरण छुने का मन करता है। वह अपने माता के साथ थी, मैंने कहा कि तुम इस साधना के अंतिम चरण तक पहुँच सकती हो।
मैं यहाँ क्या सीखा ?
1.
आध्यात्मिकता
की नयी समझ –
छात्र जीवन के बाद जीवन में कुछ कठिनाइयाँ आई तो मेरा ध्यान
आधात्मिक्ता की ओर बढ़ा। ध्यान की कई प्रक्रियाओं का मैंने थोड़ा अभ्यास किया है
जैसे बिहंगम योग, सद्गुरु (वासुदेव) के योग, त्राटक, ध्वनि, एवं मौन आदि का थोड़ा
अभ्यास किया हूँ। और मुझे इससे बहुत लाभ हुआ... लेकिन मैं कहाँ जा रहा हूँ... और
अभी कहाँ तक पहुँचा हूँ... ये पता नहीं चलता था… बस किये जा रहा था और मन
को जो शांति मिलती थी उसे लाभ मानता था।
विपश्यना आध्यात्मिक की एक राह दिखा दिया.. और मुझे दुर तक नजर आने लगा.. और मैं जहाँ खड़ा हूँ वो भी दिखने लगा.... रास्ता बहुत लम्बी है.... पता नहीं जीवन उतनी लम्बी है या नहीं।
इससे पहले के ध्यान में इतनी समझ नहीं आने का एक कारण ये भी हो सकता है कि मैं अब से पहले किसी गुरु के निर्देशन में ध्यान नहीं किया था... या तो इंटरनेट से या किताबो को पढ़ कर ही ध्यान किया था.... इसलिए पहले किये गए ध्यान को कम आँकने का अधिकार मुझे नहीं है।
2. प्रार्थना -
यहाँ के अंतिम दिन के प्रार्थना की एक पंक्ति मेरे लिए बहुत
लाभदायक रहा।
एक आम आदमी की तरह मेरे स्वभाव में कई बहुत अच्छे गुण हैं और इसी के समतुल्य कई बड़े दुर्गुण भी है… उनमे से एक है "क्षमा नहीं करना"।
मुझे क्षमा मांग लेने में जड़ा भी संकोच नहीं है, आप छोटे हों, बड़े हों, यदि मुझे लगे की मुझसे गलती हुई तो क्षमा मांगने में मैं जड़ा भी बिलम्ब नहीं करता हूँ। लेकिन यदि गलती आपसे हुई !!!! मैं क्षमा नहीं कर पाता..... यदि आप क्षमा मांग भी लो तो मुझे लगता है कि आप नाटक कर रहे हो।
मेरे साथ गलत व्यव्हार करने का किसी ने हिम्मत कैसे किया ??? अहंकार की इस मोटी दिवार को यह प्रार्थना पिघला सकता है।
10 दिन का कोर्स समाप्त हो चूका था, 11 वे दिन सुबह बिलकुल विदा होने के समय गोयनका जी यह प्रार्थना गाये - 11 वे दिन मोबाइल रखने ही छूट थी इसलिए मैंने इसे रिकॉर्ड भी कर लिया कृपया सुने -
https://static.wixstatic.com/mp3/b6bd02_803242c03bc444d99a705eb009249516.mp3
मैं करता सबको क्षमा, करे मुझे सब कोई।
मेरे तो सब मित्र हैं, बैरी दिखे न कोई।।
ध्यान करने के बाद मैं यह प्रार्थना करना शुरू किया हूँ यह मेरे मन में क्षमाशीलता को स्थान देगा।
इसके लिए आवेदन कैसे करें ?
विपश्यना के हर मेडीटेसन सेन्टर की अपनी एक Website है। आप उस पर
जायें और 10
–Days Course for New Student चुनें और अपना Form भर दें। फिर आपके पास
आपकी सीट Confirm
होने का mail आ जायेगा, जिसमें एक letter attached होगा, इस letter का print लेकर आपको
निश्चित तारीख पर विपश्यना मेडीटेसन सेन्टर पहुँच जाना है।
भारत के विपश्यना केन्द्रो की सूची और उनके
फ़ोन नंबर--
-(A) उत्तर भारत में—
1- नयी दिल्ली(लॉजिक स्टेट फ़ोन 01126452772)
2- हरियाणा में सोहना,(phone 9812655599) सोनीपत(09991874524),
करनाल, (phone
01842257543)रोहतक(09416303639)
3- पंजाब में होशियारपुर(phone
01882272333)
4- हिमाचल में धर्मशाला(phone
09218414051)
5-देहरादून(phone 01352104555)
6- लेह- लद्दाख(phone 9906986655)
7- उत्तर प्रदेश में लखनऊ, (phone
05222968525)श्रावस्ती(05252265439), सारनाथ,
(09307093485)कानपूर(phone 07388543793)
8- बिहार में मुजफ्फरपुर,(phone
09931161290) बोधगया, (phone 06312200437)नालंदा(9930796064)
9-राजस्थान में जयपुर, (phone 01412177446)पुष्कर
01452780570)अजमेर, जोधपुर,(phone
02912746435) चुरू,(phone 09414676081) आबू
में अस्थाई केंद्र
(B)गुजरात
मांडवी कच्छ, (phone 02834273303)राजकोट,(phone
02812924924 मेहसाना,(phone 02762272800) अहमदाबाद,(phone
02714294690 नवसारी(phone 02634291100), भावनगर(7878103636),
धर्मराज(02697245460)
(C) महाराष्ट्र
इगतपुरी, (phone 02553244076,)गोरई(मुम्बई),(02233747501)
बेलापुर(नयी
मुम्बई)(phone 02227522277), टिटवाला,(phone 9773069978) खडवाली(ठाणे), (phone
7798324659)पालघर, (phone 9371753833)नाशिक,(phone
02536516242) पुणे, (phone 02024468903,
02024436250)औरंगाबाद, (phone 9422211344)धुले,(phone
02562203482) कोल्हापुर,(02233747501) नागपुर, (phone
07122458686)चंद्रपुर(8007151050), अकोला,(phone
9579867890) वर्धा(07158284372),लातूर,(9421087012)
भंडारा(9423673572),
ओज़तोला,(8412044011)
मोगरा,(07212662179),
सुगतनगर(9921503273) यवतमाळ,(9422865661)
सुगतनगर
(D)दक्षिण भारत
बैंगलोर, (phone 08023712377)चेन्नई,(phone
9444290953) मदुराई,(9443728116),
तिरुवनमलै(9677446232) चेंगन्नूर(केरल),(04792351616)
हैदराबाद,(04024240290)
निज़ामाबाद,(08467316663)
नागार्जुन
सागर(09348456780), कोन्दपुर(मेडक)(9398316155),
विजयराय(08812225522),
भीमावरम(08816236566)
(E)मध्य और पूर्व भारत
मध्यप्रदेश में बालाघाट,(07632248145)
जबलपुर,
(07614006252)भोपाल,(phone 8435686418) इंदौर,(9893129888)
रतलाम09827535257),
गुना(9425618095)
छत्तीसगढ़ में दुर्ग, (07883203513)बिलासपुर(9806703919)
कोलकाता(03325532855) त्रिपुरा(9862646764)
खरियार रोड(9406237896) (उड़ीसा),जटनी(9437131019),उड़ीसा
सिक्किम(9830706481) कमला
नगर(मिजोरम)
शुल्क -
बिलकुल मुफ्त है। रहने के लिए आपको एक रूम attached बाथरूम, खाने के लिए शुद्ध शाकाहारी
भोजन, मेडिटेसन के लिए
सामूहिक हॉल और 6 दिन के बाद एक अलग छोटा रूम (पगोडा) ध्यान के लिए, बिजली, पानी, एक स्वच्छ और शांत
वातावरण सब कुछ मुफ्त है, लेकिन यह संस्था दान से चलती है।
अंतिम दिन आपको दान के लिए कहा जाएगा और मैं आग्रह करूँगा की दान देने में उदारता रखे और हाँ यदि आप बेरोजगार हैं या छात्र हैं तो आप बिलकुल कुछ ना दे सिर्फ अच्छी तरह से इस विद्या को सिख लें, यही बहुत बड़ा दान हो जाएगा।
अंत में
(उन
लोगों के लिए जो एक बार विपश्यना शिविर में जा चुके हैं)
मित्रों, हो सकता हैं कि आप कुछ ऐसे लोगों को जानते होंगे जो विपश्यना शिविर में जा चुके हैं, लेकिन उनके जीवन में, उनके व्यव्हार में, उनके आचरण में कोई परिवर्तन नजर नहीं आया और आप मेरे इतनी बड़ी बड़ी बातों पर संदेह कर सकते हैं।
ऐसा नहीं हैं कि 10 दिन के बाद... जब आप शिविर से बाहर आते हैं... तो बुद्ध बन चुके होते हैं... काश कोई ऐसा जगह होता। 10 दिन में यहाँ आपको बुद्धत्व का एक बहुत ही नाजुक बीज मिलता है... जिसे एक वर्ष तक आपको प्रतिदिन ध्यान करके उसे बृक्ष बनाना होता है... यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो अगले 30 दिन में वह बीज सुख कर मर जायेगा।
आप किसी भी ऐसे व्यक्ति नहीं खोज सकते हैं जिन्होंने एक वर्ष तक इस ध्यान का अभ्यास किया और उनके जीवन में परिवर्तन नहीं आया।
एक वर्ष के बाद आपको सींचने का जरुरत नहीं है... वह अपनी जड़े जमा लेगा और बढ़ता ही चला जाएगा। यदि आप एक वर्ष तक इस अभ्यास को नियमित नहीं रखते हैं तो आप बुद्धि के स्तर से तो बात को समझ लेंगे, लेकिन वह आपके चेतना का अंग नहीं होगा।
मेरे जो मित्र वहाँ जा चुके हैं वे मेरे बात को बहुत अच्छी तरह समझ रहे होंगे क्योंकि यह बात आदरनिये गोयनका जी ने अच्छी तरह समझाए हैं। मेरे समझाने कि क्षमता तो अत्यंत तुच्छ है।
जो मित्र वहाँ जा चुके हैं और अभ्यास को नियमित नहीं रख सके
मैं उनसे निवेदन करूँगा वे फिर से वहाँ जायँ और इस बार अभ्यास को नियमित रखे......
जीवन में आनंदित रहें।
एक सावधानी -
विपश्यना शिविर में पति-पत्नी या माँ-बेटा/बेटी साथ ना जाये
तो अच्छा। समस्या ये होती है कि आप दोनों एक ही स्थान पर हैं... एक ही प्रकार का
खाना खाते हैं... लेकिन एक दूसरे के साथ नहीं खाते हैं। ध्यान कक्ष में आप एक
दूसरे को देखते हैं... लेकिन कोई बात नहीं कर सकते।
अब मान लीजिये कि आज बैगन की सब्जी बनी जो आपके पति/बेटा/बेटी को पसंद नहीं.. वे मुँह में भी नहीं ले सकते... ऐसा भी नहीं है कि चार प्रकार की सब्जी मिलती है... बैगन नहीं तो पनीर की साथ खा लेंगे... आप सोचते हैं कि आज तो वे भूखे ही रह गए होंगे... आप उदास मन से ध्यान कक्ष में आते हैं... आपके पति/बेटा/बेटी आपको उदास देखते हैं.... सोचने लग सकते हैं..... इसे जो कभी कभी बेचैनी वाला सर दर्द आ जाया करता था... कहीं वह तो नहीं आ गया ?
और भला पत्नी और माँ को उदास देखकर किसको मोक्ष चाहिए ??
बाप-बेटा जा सकता... क्योंकि बाप, बेटे क़े छोटे मोटे तकलीफ को नहीं देखता है... और बेटा तो बाप की तरफ कभी देखता ही नहीं है... इसलिए कोई समस्या नहीं होगी।
यदि आपको कोई सुई चुभ जाय... तो मुँह से उई माँ निकलता है... लेकिन आपका मोटरसाइकिल ट्रक से टकरा जाय... तो मुँह से बाप रे निकलता है... वहाँ उई माँ जैसी घटना होती रहती है... बाप रे जैसी कोई घटना होती नहीं।
सबसे अंत में
यदि आप बुजुर्ग हैं, तो मैं आपको आदर सहित
निवेदन करता हूँ कि... जीवन तो अब जाने को है... क्या आप अपने इस जीवन को... जाने
से पहले... एक बार समझ लेने का प्रयास नहीं करेंगे ??? एक बार 10 दिन का समय निकालिये वहाँ
से वापस आकर आप मुझे धन्यवाद कहने से नहीं बच पाएँगे ?
यदि आप मेरे हमउम्र हैं, वास्तविक मित्र… फेस बुक पर तो सब मित्र ही होतें हैं लेकिन व्यावहारिक मित्र तो हमउम्र के लोग ही होते हैं… तो आपका भी जीवन अभी बहुत बचा नहीं हैं 10 दिन का एक समय इस जीवन के लिए अर्पित कीजिये।
यदि आप मेरे शिष्य हैं...या अन्य किसी कारण से मेरा सम्मान करते हैं...जीवन में कभी मेरे आज्ञाओं के अधीन रहे हैं... तो मैं आपको यह आज्ञा देता हूँ कि एक वर्ष के अंदर मेरे अगले जन्मदिन तक आप 10 दिन का समय निकालें और इस ज्ञान का लाभ लें। आपने मेरे जिस किसी भी आज्ञा का पालन किया होगा उससे आपको लाभ ही मिला होगा इस आज्ञा से भी आप लाभान्वित होंगे।
आप चाहे किसी भी जाती के हों वहाँ किसी देवता/पैगम्बर/वाहे गुरु/आदि कि पूजा नहीं होती। वहाँ कोई मंत्र जाप आत्मा परमात्मा का चर्चा नहीं होता। वहाँ सिर्फ आपको अपने बारे में जानने को मिलेगा। आपका मन आपका शरीर, आपकी बुद्धि, आपकी चेतना और आपकी दुनियाँ को आप समझ पाएंगे।
विपश्यना को लिखकर नहीं समझाया जा सकता है। यह एक प्रैक्टिकल क्लास है जिसे प्रयोगशाला में जाकर समझना होगा।
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इस सम्बन्ध में और किसी भी प्रकार के जानकारी के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
आपका अभिनन्दन हैं।
आपका मंगल हो, सभी का कल्याण हो, संसार के सभी व्यक्ति
मुक्त हों।
“भवतु सर्व मंगलम”
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लीजिये।
आभार
सोहन कुमार
मोगा पंजाब, दिनांक – 09.08.2021
(सोमबार)) (श्रावण शुक्ल - प्रतिपदा)









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