मेरे राम सिर्फ दशरथ नंदन राम नहीं है, जिनकी मूर्ति मंदिर में स्थापित की जाएगी, वो तो सिर्फ एक प्रतिक हैं। मेरे राम मेरी संस्कृति हैं, मेरे संस्कार हैं, मेरी शिक्षा
हैं जो मुझे बिपरीत परिस्थिति में भी प्रेम करने की शिक्षा देतें हैं। मेरे गीता
और रामायण हैं।
सन 1524 में जब मेरे
राम मंदिर को बिध्वंस किया गया, वह सिर्फ एक
भवन या मूर्ति का बिध्वंस नहीं था, वह मेरी
संस्कृति, मेरे संस्कार, मेरी शिक्षा का बिध्वंस था। जो आज तक लगातार होता रहा हैं।
आज यदि आपने तिलक लगा लिया, बालों में
चोटी रख लिया, रुद्राक्ष पहन
लिया तो आप मूर्खों की श्रेणी में गिने जायेंगे जो किसी समय विद्वता का निशानी हुआ
करता और जो वैज्ञानिकता के कसौटी पर खरा हैं। मैंने 5000 वर्ष पहले चाँद और सूरज के दुरी के नाप लिया था, इसलिए मुझे अवैज्ञानिक समझने का मूर्खता मत करना। तुम मूर्खों की तरह वेश-भूषा
और बाल रखकर अपने को आधुनिक समझ रहे हो।
यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ, इसकी शुरुआत 1524 में बाबर ने किया, बाद में
अंग्रेजो ने और आजदी के बाद हमारा संबिधान ने, हमारी शिक्षा पद्धति ने, हमारे मनोरंजन
के साधन सिनेमा ने, हमारी राजनितिक
निष्क्रियता ने और सबसे बढ़कर मेरे राम की इच्छा ने। मेरे राम तो बनवास भी अपने
इच्छा से ही गए थे।
आजादी से पहले जो कुछ भी हुआ, हम मान सकते
हैं की हम गुलाम थे और बेबस भी। सीता यदि रावण के लंका में हो, तब भी मेरे राम ने धैर्य रखने की शिक्षा दिया हैं। लेकिन आजादी के बाद मेरे
साथ जो भी हुआ उसकी व्याख्या मैं एक-एक करके कई एपिसोड में करूँगा। पहले आजादी के
बाद जो हमारे देश का संबिधान बना उसकी चर्चा करते हैं।
भारत के संबिधान में सिर्फ कवर पर लिखा हैं “धर्म निरपेक्ष” बाकि या तो वह
कई देशों के संबिधान का फोटो कॉपी हैं या मेरे राम को बिध्वंस करने की पूरी साजिश।
क्या आपको पता हैं की संबिधान की धारा 30A क्या हैं ?
अभी आप सभी संबिधान की धारा 327 और 35A का चर्चा सुना होगा जिसे परम आदरनिये मोदी जी ने निरस्त किया।
अब धारा 30A के बारे में
समझिये इस धारा के अनुसार मेरे राम मंदिरों में जो चढ़ावा आता हैं, उस पर सरकार का नियन्त्र होगा, उस धन का
उपयोग मैं अपने धर्म की रक्षा और उसका प्रचार में खर्च नहीं कर सकता, परन्तु, मस्जिदों में
जो चढ़ावा आएगा उस पर सरकार का कोई नियन्त्र नहीं होगा, वो चाहे तो अपने धर्म प्रचार के लिए मदरसा चला सकते हैं या आतंकवादी कैंप भी
खोल सकते हैं।
मेरे राम के अतिरिक्त कोई भी धर्म अपना धर्म प्रचार और विद्यालय खोल सकता हैं।
आखिर मेरे से इतनी पक्षपात भरा नफरत क्यों ? मैंने किसी पर कभी आक्रमण नहीं किया, मैंने अपने
विस्तार के लिए कभी किसी पर दबाब नहीं बनाया, और न ही कभी किसी को कोई प्रलोभन दिया । मैं तो आपके दुःख से दुखी और खुसी से
खुस होने वाला हूँ। मैं तो
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥"
के सिद्धांत को मानने वाला हूँ।
जब 423 वर्षों के बाद
मुझे मुगलों और अंग्रेजों के शासन से मुक्ति मिला उसके बाद मुस्लिमों को उसके
इच्छा के अनुसार एक देश दे दिया, ये भी कोई
आपत्तिजनक बात नहीं है लेकिन जो मुस्लिम इस देश में रह गए उनके साथ भी हमें बराबर
का दर्जा क्यों नहीं दिया गया ? हमारे और उनके
साथ भेद भाव क्यों किया गया ? जिस तरह का
भेद भाव मुग़ल कल में हिंदुओं पर जजिया कर लगा कर किया जाता था, क्या 35 A जजिया कर के सामान नहीं है ? क्या आज भी हम
मुगलों और अंग्रेजो के अधीन है ? या स्वतंत्र
देश के स्वतंत्र नागरिक है ? मुझे संदेह
है।
मैं मुस्लिम या अन्य धर्मों के मानने वाले बंधुओं से निवेदन करता हूँ की वे
मेरी बात को मेरे नजर से देखें। मैं उनको इस देश का अभिन्न अंग मानता हूँ। और ऐसा
भी नहीं हुआ कि आपको इन राजनितिक कारणों से कोई लाभ हुआ, आप भी वहीँ है सिर्फ ये राजनितिक दलों ने आपके वोटों का लाभ लिया।
आप भी मेरे राम को उतने ही प्रिये है जितना मैं।
मैं बहुत जल्दी "मेरे राम" का अगला भाग लेकर आ रहा हूँ।
आप मेरी बात को बहुत ध्यान से पढ़ते है, इसके लिए आपका बहुत आभार।
अपना और अपने परिवार का ख्याल रखिये।
आभार
सोहन कुमार
08.08.2020
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